Saturday, January 23, 2021 03:18 AM

विवाद से परे है ईश्वर का अस्तित्व

अमरीका के सैनियागो चिडि़याघर में एक बार एक बंदर दंपति ने एक बच्चे को जन्म दिया। माता ने खूब स्नेह और प्यार से बच्चे का पालन-पोषण किया। बच्चा अभी 20 महीने का ही हुआ था कि माता ने एक नए बच्चे को जन्म दिया। यद्यपि पहला बच्चा मां का दूध पीना छोड़ चुका था, तथापि संसार के जीव मात्र को भावनाओं की न जाने क्या आध्यात्मिक भूख है, उसे अपनी मां पर और किसी का अधिकार पसंद नहीं आया। उसने उसे छोटे भाई को हाथ से पकड़ कर खींच लिया और खुद जाकर मां के स्तनों से जा चिपका…

-गतांक से आगे…

कुछ दिन दोनों बहुत प्रेम पूर्वक साथ-साथ रहे। एक दूसरे को चाटते, थपथपाते, हिलते-मिलते, खाते-पीते रहे और इसी बीच एक दिन उसके मालिक को फिर बाहर जाना पड़ा। इस बार भेडि़ए ने किसी से न दोस्ती की और न कुछ खाया-पीया। उस दिन से वह बीमार पड़ गया और प्रेम के लिए तड़प-तड़प कर अपनी लीला समाप्त कर दी। उसके समीपवर्ती लोगों के लिए भेडि़या उदाहरण बन गया। वे जब कभी अमानवीय कार्य करते, उन्हें भेडि़ए की याद आती और उनके सिर लाज से झुक जाते। बर्लिन की एक सर्कस कंपनी में एक बाघ था, नीरो उसका नाम था। इस बाघ को लीरिजग के एक चिडि़याघर से खरीदा गया था। जिन दिनों बाद चिडि़याघर में था, उसकी मैत्री चिडि़याघर के एक नौकर से हो गई। बाघ उस मैत्री के कारण अपने हिंसक स्वभाव तक को भूल गया।

 पीछे वह क्लारा इलियसट नामक एक हिंसक जीवों के प्रशिक्षिका को सौंप दिया गया। एक दिन बाद बाघ प्रदर्शन से लौट रहा था, तभी एक व्यक्ति निहत्था आगे बढ़ा- बाघ ने उसे देखा और घेरा तोड़कर बाहर भाग निकला। भयभीत दर्शक और सर्कस वाले इधर-उधर भागने लगे, पर स्वयं क्लारा इलियट यह देखकर दंग रह गई कि बाघ अपने पुराने मित्र के पास पहुंचकर उसे चाट रहा और प्रेम जता रहा है। उस मानव मित्र ने उसकी पीठ थपथपाई प्यार किया और कहा-अब जाओ, समय हो गया है। बाघ चाहता तो उसे खा जाता, भाग निकलता, पर प्रेम के बंधनों में जकड़ा हुआ बेचारा बाघ अपने मित्र की बात मानने को बाध्य हो गया। लोग कहने लगे सचमुच प्रेम की शक्ति ऐसी है, जो हिंसक को भी मृदु शत्रु, शत्रु को भी मित्र और संताप से जलते हुए संसार सागर को हिमखंड की तरह शीतल और पवित्र कर सकती है।

भावनाओं में अभिव्यक्त विश्वात्मा

अमरीका के सैनयिगो चिडि़याघर में एक बार एक बंदर दंपति ने एक बच्चे को जन्म दिया। माता ने खूब स्नेह और प्यार से बच्चे का पालन-पोषण किया। बच्चा अभी 20 महीने का ही हुआ था कि माता ने एक नए बच्चे को जन्म दिया। यद्यपि पहला बच्चा मां का दूध पीना छोड़ चुका था, तथापि संसार के जीव मात्र को भावनाओं की न जाने क्या आध्यात्मिक भूख है, उसे अपनी मां पर और किसी का अधिकार पसंद नहीं आया। उसने उसे छोटे भाई को हाथ से पकड़ कर खींच लिया और खुद जाकर मां के स्तनों से जा चिपका।

 (यह अंश आचार्य श्रीराम शर्मा द्वारा रचित पुस्तक ‘विवाद से परे ईश्वर का अस्तित्व’ से लिए गए हैं।)

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