Tuesday, June 15, 2021 11:26 AM

व्यंग्य की मिट्टी से सनी योगेश्वर शर्मा की शैली

यहां व्यंग्य जीवन के परिधान की तरह है। रोजाना नई व विचित्र परिस्थितियों के बीच खुद को पेश करने का एक समाधान। कमोबेश हर घटनाक्रम के बीच अगर जीने का नजरिया ढूंढा जाए, तो यह खुद पर कटाक्ष करने का संयम और गुदगुदी पैदा करने का अवसर बन सकता है। ‘कविता की किताब और सर्फ का पैकेट’ अपने भीतर हास्य के कई गठबंधन करता संग्रह है, जिसमें व्यंग्य के नए मुहावरे, परिस्थितियों का घालमेल और लेखकीय प्रेक्षण का अद्भुत मेल-मिलाप है। इसलिए जिंदगी में चुटकुलों से सहजता भरती ‘रेस यानी दौड़’ हो या ‘कामर्शियल ब्रेक’, लेखक की अनुभूतियां सरल-स्वाभाविक होकर भी परिदृश्य से अपने हिस्से का व्यंग्य छीन लेती हैं। ‘सब मोबाइल पर हैं’ जैसी रचना के भीतर मानव के अकालग्रस्त प्रसंग नए उद्गार को जन्म देते हैं, ‘मुझे लगा कि वहां कोई ड्राइंग रूम है ही नहीं और मैं भी वहां नहीं हूं’। ‘कबड्डी’ में व्यंग्य तलाशने और तराशने की लेखकीय क्रीड़ा का उत्साह देखिए कि वह झट से इसे ‘बोलती गेम’ डिक्लेयर करके अनूठी उपमाओं की गागर में समेट लेता है।

यहां व्यंग्य अपने बिंदुओं के बाहर के घर्षण को भी जाहिर करता है और इसके अगल-बगल साहित्यिक उत्कंठा को छुपा कर आगे बढ़ जाता है। ‘दादा उर्फ भाई’ में व्यंग्य की ऊंचाई और ‘शुद्ध, नखालिस’ में शुद्धता-शुचिता के अनुमान की विश्वास परंपरा का जिक्र अपने ही घर से बेहतर कहां होगा। विश्वास के तर्क ही दरअसल शुद्धता की गारंटी बन जाते हैं। बतौर लेखक शुद्ध दूध की गारंटी यह भी तो हो सकती है कि दूधवाला जिस रास्ते से इसकी आपूर्ति करता है, वहां पानी का स्रोत नहीं है। ‘दारू बहुत हो गई’ में व्यंग्य खुद को खोजता है, मानो दारू से हर पियक्कड़ अपनी जिंदगी बाहर निकाल लेता है। संग्रह में इक्कीस रचनाओं के माध्यम से व्यंग्य अपनी कहानियों में परिमार्जित होता है और जिंदगी के कमोबेश हर पहलू में विराजमान हो जाता है। ‘काल बैल’ में किसी अनजान आगंतुक के आने पर मेहमाननवाजी के सारे शिष्टाचार किस तरह संदेह के सुरक्षा कवच पहन लेते हैं, कमाल की प्रस्तुति है। लेखक का लहजा और संबोधन की शैली की खासियत यह है कि जीवन चित्रण की सामान्य तूलिका भी कई रंगों में भीग जाती है। मसलन ‘दांत अकड़ जाएं’, तो मुश्किल, जीभ अकड़ जाए, तो मुश्किल, कहते-कहते लेखक दांतों के जरिए पूरी यात्रा गिना देता है। लेखकीय ईमानदारी में व्यंग्य की निर्मल तासीर लिए योगेश्वर शर्मा ‘मेरे घर चोरी हुई’ में मध्यमवर्गीय चिंताओं को पूरी तरह कुरेद देते हैं। लेखक अपने सरोकारों में पाठक को लेकर चलते हैं, बल्कि कई बार खुद कहीं छुप कर पाठक को ही खुद पर मंद-मंद मुस्कराने का एहसास कराते हैं। हास्य की परिस्थितियों में नेता का स्वर्ग पहुंचना या सांस्कृतिक संध्या में कलाकार का नामी होना, व्यवस्था की विकृतियों पर सीधी चोट है।

व्यंग्य के अपने साहित्यिक प्रयोग करते हुए योगेश्वर शर्मा नई मिट्टी बटोर लेते हैं। ‘कविता की किताब और सर्फ का पैकेट’  वास्तव में एक मानसिक धुलाई सरीखी प्रक्रिया है। लेखक अंततः संग्रह से ही पूछ लेता है कि इसमें व्यंग्य है कितना, फिर अगले ही पल कवि मित्रों पर सहज-सरल कटाक्ष करते समझा देते हैं कि कविता आजकल कितनी कामचोर हो गई है। कवि सम्मेलनों पर ये पंक्तियां शायद झांकने का मौका दें या यथार्थ पर चोट का कोई असर हो, ‘कुछ ऐसा भी हो गया है कि जहां कवि सम्मेलन हो रहा हो, वहां लोग (श्रोता) अपना रास्ता ही बदल देते हैं। उन्हें लंबे रास्ते से जाना मंजूर, लेकिन कविता सुनने के लिए उनके पास समय नहीं है।’

-निर्मल असो

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