Sunday, July 25, 2021 08:39 AM

दिल्ली से खत का इंतजार-1

दिल्ली बैठकों का जाम पीकर हिमाचल कितने नशे में आता है, यह देखने की बात है, लेकिन हम कह सकते हैं कि मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के हाथ में फिर कुछ इबारतें खिंच गईं। कोरोना काल की बैठक में यूं तो किस्सा महामारी से वैक्सीन की भरपूर आपूर्ति का ही होना चाहिए, लेकिन यहां तैयारियों की मशक्कत में अगले साल का चुनाव फंसा है। हमें डबल इंजन के वादों पर अब दिल्ली दौरों का सूत्रधार बनना है, लिहाजा मुख्यमंत्री के पास अब हमेशा दिल्ली का खत होगा। खत में खुशखबरी, खत में खुशहाली और खत में ही अगले चुनाव की रखवाली होगी। दिल्ली की मुलाकातें फिर से लिखी जाएंगी, यह समुद्र के रास्ते हैं गहरे तो दिखाई देंगे ही। इसलिए जब मुख्यमंत्री देश के गृहमंत्री से मिलते हैं, तो मंत्रालय से कहीं हटकर ‘चुनावालय’ कर मौसम रहता है। बहरहाल अगर यही बरसात है, तो हम वर्षों के सूखे को मिटाना चाहेंगे। ऐसा नहीं कि कोई सूखा रहा नहीं और ऐसा भी नहीं कि इससे पहले बारिश हुई नहीं। प्रदेश जानता है कि जिन नेशनल हाई-वे और फोरलेन के निर्माण को गति देने के लिए मुख्यमंत्री केंद्रीय मंत्री नितिन गड़करी से मिले, वे भी कभी बरसात के मानिंद बरसे थे।

 शायद घोषणाओं का पुराना पानी बह गया होगा। तब कांग्रेसी मंत्री जीएस बाली और गडकरी के बीच पींगें दिखाई दी थीं व उम्मीद भी जागी थी कि हिमाचल अब फर्राटे से इन्हीं रास्तों पर दौड़ेगा, लेकिन घोषणाओं की कब्र पर भी घंघरू कभी शांत नहीं होते तो पिछला एक दशक यही सुनने को आतुर रहा कि कब शिमला-धर्मशाला और पठानकोट-मंडी फोरलेन सहित वे तमाम राष्ट्रीय उच्च मार्ग हमसे हमारी बैसाखियां छीन लेंगे। उम्मीद करनी चाहिए कि कोरोना काल के पन्नों पर हिमाचल का एक नया मान चित्र उभरेगा और जहां हर केंद्रीय मंत्री कुछ न कुछ उकेर देगा। इसलिए केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर का सवाल अहमियत रखता है कि आखिर ऊना के पीजीआई सेटेलाइट सेंटर के पत्थर आज तक शिलालेख क्यों नहीं बने। क्यों ऐसी महत्त्वाकांक्षी परियोजनाएं चुनाव के आसपास ही फड़फड़ाती हैं और आखिर इन्हीं उड़ारियों में मतदाता भी उड़ जाता है।

 हो सकता है कल अनुराग ठाकुर फिर विकास की झाडि़यों के कान पकड़ कर केंद्रीय विश्वविद्यालय को खींच लाएं और तब हम समझें कि इस बार स्थायी कुलपति की तलाश से पहले, परियोजना के नाम पर अब तक गले से लटके तमाम सूखे फूल फिर से खिल जाएं। खैर हिमाचल की किस्मत कहें या हमारा दस्तूर कि हर बार केंद्र के भरोसे दौड़ते अरमानों को हमने डबल इंजन बनाने की कोशिश की। हर बड़े प्रधानमंत्री ने हिमाचल से नाता जोड़ा, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी की यादें कुल्लू व लाहुल-स्पीति को चिन्हित करती रहेंगी। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंडी की छात्रा से दो दिन पहले ही सेपु बड़ी का हाल पूछा है तो यही खत सोलन के एक बच्चे से भी सीधा संवाद करता है। ऐसे अनेक अवसर आए जब प्रधानमंत्री ने हिमाचल से मुलाकात का नजरिया भी ब्रांड बनाया और इससे सम्मोहन से छवि तक इजाफा हुआ। देश अगर हमें समन्वित विकास के शिखर पर बैठाता है या एनीमिया नियंत्रण में हमें तमगे मिलते हैं, तो शिरोधार्य होते कर्ज को उतारना भी पड़ेगा। बहरहाल मुख्यमंत्री की दिल्ली मुलाकातों का एक सफर है, जिसे कमतर नहीं आंका जा सकता। दो सौ करोड़ का इथेनॉल संयंत्र या साठ करोड़ के स्टेट ऑफ आर्ट मार्डन अस्पताल की पेशकश में कृतज्ञ हिमाचल को ताली बजानी होगी। कौन नहीं चाहेगा कि हर बार मुख्यमंत्री दिल्ली जाएं और सारे हिमाचली ताली बजाएं। कई हाथ आज भी कुछ पाने और फिर ताली बजाने के लिए आतुर हैं। कुछ पद आज भी रिक्त रहने की सजा भुगत रहे हैं, जबकि कुछ चेहरे पाने की अभिलाषा में अपनी राजनीति के उपहार ग्रहण करने के लिए कदमताल कर रहे हैं। क्या कुछ ऐसा भी होगा, यही असली पिटारा है जो आसानी से नहीं खुल रहा।