Sunday, July 25, 2021 07:13 AM

दिल्ली से खत का इंतजार-2

सियासी सफर के मुकाम पर केंद्र से रिश्तों की बिसात और हकीकत के अर्थ में खोजा-पाया के हालात में मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के कार्यकाल का हिसाब, अब राजनीति का ऐसा गणित है जिससे प्रदेश की नागरिक जागरूकता अलंकृत होगी। केंद्र सरकार का हर फैसला जयराम ठाकुर को छांव देता रहा है और इसी तरह वैक्सीन की मांग अब उनके दायित्व को सरलता प्रदान करेगी। हमारा मानना है कि अगला चुनाव कोरोना काल के संबोधनों को याद करेगा और इन्हीं कदमों पर चलते हुए भाजपा की सत्ता को अपने प्रदर्शन की बेहतरी तराशनी होगी। ऐसे में दिल्ली दौरे की खनक में विकास के कंगूरे खड़े किए जा रहे हैं, तो केंद्रीय स्तर की मुलाकातें राजनीतिक छवि का परिमार्जन करते हुए मुख्यमंत्री के पक्ष में रेखांकन का नया दौर भी हो सकता है। विकास के घुटनों का दर्द हिमाचल महसूस करता रहा है, तो क्या चुनाव से ठीक पहले इनका आपरेशन हो रहा है, क्योंकि केंद्र के द्वार पर फिर से सड़क परियोजनाओं के मील पत्थर लग रहे हैं। यहां सवाल शिमला से नहीं कि दिल्ली कितनी दूर, बल्कि दिल्ली से है कि कभी नजदीक से भी पहाड़ सुहावने होंगे। जिस सुरंग पर मोदी राज का अलंकरण हुआ है, वह दरअसल अटल विहारी बाजपेयी के साथ प्रेम कुमार धूमल के रिश्तों का व्यावहारिक पक्ष भी तो है।

 जिस ऊना ट्रेन की पटरी पर आज कुछ पहिए घूमते हैं, उसको आगे बढ़ाने की फितरत क्यों दिखाई नहीं देती। क्यों हमीरपुर को जोड़ती रेलवे लाइन का राग ठंडा पड़ गया और बजट की आबरू में कांगड़ा एयरपोर्ट विस्तार की फाइल का हमेशा चीर हरण होता रहा। जयराम सरकार की आरंभिक फाइलों से कांगड़ा और हमीरपुर की बड़ी परियोजनाओं को खुर्दबुर्द करता एक मंत्री आज हिमाचली राजनीति के बड़े सपनों का सौदागर बनने की शक्तियां कैसे एकत्रित कर पाया। इस दौरान ढेर हुए कांगड़ा के नेता, उपेक्षित हुए मंत्री तथा सत्ता के लाभार्थी बने संघ परिवार के सदस्यों का असंतुलन क्या दुरुस्त हो पाएगा। वर्तमान हालात के सिर पर सींग बनकर उगे तीन उपचुनाव, भाजपा के करामाती होने के युद्ध में हैं तो घात-प्रतिघात कहीं पार्टी के भीतर, उल्टे बांस बरेली के न उगा दें। ये तीनों परीक्षाएं क्षेत्रीय संतुलन में इसलिए भी पढ़ी जाएंगी, क्योंकि कहीं कांगड़ा, कहीं मंडी, तो कहीं शिमला की पृष्ठभूमि में ये चुनावी बिसात बिछेगी। राजनीति के दत्तक पुत्र बनने की कई नई परंपराएं सत्ता से हासिल को बयां करती हैं। पिछली बार धर्मशाला और पच्छाद के उपचुनाव ने उम्मीदवारों के चयन से सफलता के प्रतिबिंब तक मुख्यमंत्री का साथ दिया था, तो इस बार कहीं तो सियासी तड़का बदलेगा। इस बार तीनों उपचुनावों में सत्ता की समीक्षा के साथ-साथ, भाजपा खुद को वंशवाद के नारों से कितना दूर रख पाती है, यह भी देखना होगा। यह इसलिए कि कोरोना काल में बंटती इम्युनिटी किटों पर भाजपा नेताआ की औलाद दिखाई दे रही है।

 इन किटों के सहारे कई चुनाव और चुनावी प्रक्रियाओं में उतरते नेताओं के उत्तराधिकारी देखे जा सकते हैं। इस काम में भाजपा ही नहीं, बल्कि कांग्रेसी तो अपनी परंपरा की सोहबत में प्रफुल्लित हैं। क्या भाजपा के कार्यकर्ता अब कांग्रेसी पायजामा पहनकर चलेंगे और प्रदेश में वंशवाद के नए पुरोधाओं को अगले चुनाव की वैतरणी पार कराएंगे या कहीं भीतर का गुस्सा पहाड़ी जटाओं की ऐंठ खोल देगा। बहरहाल मुख्यमंत्री को तीन दुर्गों पर पताका फहराने के लिए जनता का विश्वास, केंद्र का आश्वासन, पार्टी में एकजुटता और जगत प्रकाश नड्डा का प्रश्रय चाहिए। इसमें दो राय नहीं कि भाजपा की गोद में हिमाचल के मुख्यमंत्री के लिए राजनीतिक लालन पालन जारी है और इसी की कुछ खुराकें लेकर वह दिल्ली से लौट आए हैं। इन खुराकों में उनके लिए कितनी टॉनिक, इम्युनिटी बूस्टर तथा बाह्य वातावरण से सुरक्षित रहने का कवच मिलता है, यह आने वाला वक्त ही बताएगा।