Sunday, July 25, 2021 08:10 AM

दिल्ली से खत का इंतजार-3

दिल्ली के खत अकसर कोमल नहीं होते और इसीलिए कमोबेश हर सत्ता को पीछे मुड़कर देखना पड़ता है। वर्तमान दौर में भाजपा की राष्ट्रीय सियासत को पढ़ने के लिए उत्तर प्रदेश के योगी आदित्य नाथ के नाम खत के कई अर्थ समझे जाएंगे। इससे पहले उत्तराखंड में उस्तरा चला और भाजपा अपनी झोली में नए मुख्यमंत्री को नगीना बनाकर भी कोरोना काल के अभिशप्त अध्यायों को फनां नहीं कर सकी, तो अब यह स्पष्ट हो रहा है कि तमाम विडंबनाओं के बावजूद उत्तर प्रदेश में योगी रहेंगे। योगी के रहने या जाने से हिमाचल की सियासत के पत्ते न खुलें, लेकिन संघ परिवार के मंथन ने इतना समझ लिया है कि आगामी विधानसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रमुख चेहरा नहीं होंगे। यानी दिल्ली का दस्ती खत लेकर लौटे मुख्यमंत्री के पास साहस, समर्थन और सुविधा के सबसे बड़े अधिकार हैं। इसीलिए उनके लौटते पांव हिमाचल की सतह पर मजबूती से देखे जा रहे हैं यानी वह प्रदेश के सियासी रथ को अब चुनाव की प्रत्येक राह पर खुद ही चलाएंगे।

 आज जबकि भाजपा के शक्तिमान और देश के सबसे बड़े प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ पार्टी और संघ परिवार के किंतु-परंतु में फंसे हैं, तो दूसरी ओर छोटे से हिमाचल से जयराम ठाकुर का ताल्लुक पुरस्कृत होकर लौटा है और इसीलिए वह हर किसी विरोध या साजिश से आंख मिलाकर पूछ सकते हैं,‘कोई शक’। प्रदेश को अब संदेह करने की कोई गुंजाइश नहीं मिलती, लेकिन केंद्रीय प्रश्रय के ताबीज पहनकर अब मुख्यमंत्री को एक ओर प्रदेश को कोरोना से बचाना है, तो दूसरी ओर आर्थिक गतिविधियों के समानांतर विकास के रुके पहिए को भी घुमाना पड़ेगा। दिल्ली की कसरतें यूं तो फरियादी चिट्ठियों से अटी पड़ी हैं, लेकिन इन्हें चुनकर कौन जवाब देगा, इसका इंतजार रहेगा। मुख्यमंत्री खुद से कुछ सवाल पूछ सकते हैं और इनमें सबसे अहम है केंद्रीय प्रश्रय में ताकतवर होना व दिखाई देना। दूसरा यह है कि अपनी टीम के मंत्रियों को काम की दृष्टि से सफल बनते देखना और जनता को दिखाई देना। तीसरा, उपचुनावों की कड़ी में क्षेत्रीय महत्त्वाकांक्षा के फलक पर जननायक बनना और दिखाई देना। राजनीतिक नियुक्तियों में पार्टी के खाली छोर को भरना तथा भरते हुए दिखाई देना।

 वर्तमान सरकार के कद और प्रारूप में विद्यार्थी परिषद की पृष्ठभूमि से अलहदा भाजपा की पृष्ठभूमि का नया कैनवास पैदा करना और यह करते हुए दिखाई देना भी मुख्यमंत्री के सामने प्रश्न होना चाहिए। मुख्यमंत्री हर विभाग के प्रश्नों में मंत्रियों से प्रश्न करें और प्रश्न करते हुए दिखाई दें और इसी कड़ी में मंत्रिमंडल के सबसे ताकतवर मंत्री महेंद्र सिंह के वजन से बड़ा दिखना और दिखाई देना भी इन्हीं कसौटियों का अहम हिस्सा है। प्रदेश की राजनीति में इससे पहले महेंद्र सिंह ने एक बार धूमल सरकार का पलड़ा अपनी ओर झुका लिया था। इसका परिणाम उन्हें तो सफल कर गया, लेकिन धूमल सरकार को रिपीट करने के खिलाफ गया। अब पुनः सशक्त महेंद्र सिंह का दायरा उनकी निजी सफलता को तो पारंगत कर रहा है, लेकिन इस दोष के छींटे सरकार पर पड़ रहे हैं। इसकी पुष्टि हाल ही में प्रशासनिक फेरबदल में हुई है। जिस तरह वरिष्ठ व तेज तर्रार आईएएस अधिकारी आेंकार शर्मा को बागबानी विभाग से जोड़ने के फैसले को महेंद्र सिंह ने कचरे के डिब्बे में डाल दिया, उससे मंत्री का कद तो बढ़ गया, लेकिन सरकार झुक गई या उनकी अहमियत के पीछे छिप गई। इसलिए दिल्ली से लौटे मुख्यमंत्री ने जिस तरह जोशीले संदेश में अपनी अहमियत बताई है, उसी तरह सरकार की अहमियत में उन्हें महेंद्र से ऊपर दिखना है और यह करते हुए दिखाई देना है, वरना अतीत के जख्म सुखराम से धूमल तक आज भी रिसते हैं, इसकी वजह और प्रमाण हैं।