Sunday, July 25, 2021 07:28 AM

दिल्ली से खत का इंतजार-4

हिमाचल के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर इस समय भाजपा के तमाम मुख्यमंत्रियों के बीच अपनी रेटिंग सुधार पाए, तो यह सुरक्षा कवच पहनकर ही वह शिमला लौटे हैं। उत्तर प्रदेश में योगी और कर्नाटक में येदुरप्पा खुद को सत्ता का असली हकदार मानकर भाजपा आलाकमान को इस वक्त नचा रहे हैं। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीर्थ सिंह रावत और हरियाणा के मनोहर लाल खट्टर से कहीं बेहतर स्थिति में हिमाचल के मुख्यमंत्री का आकलन इसलिए भी हुआ है, क्योंकि वह केंद्र की नजरों में आज्ञाकारी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के अनुगततः हैं। राष्ट्रीय परिस्थितियों के बीच नड्डा की एक प्रयोगशाला का हिमाचली होना उन्हें हमेशा जयराम ठाकुर के नजदीक खड़ा करता है। यही एक वजह है कि मुख्यमंत्री के सामने न पार्टी और न ही सरकार के भीतर कोई चुनौती दिखाई देती है, भले ही कुछ लोग अति साहस में उनके विकल्प गिनते रहें। इतना ही नहीं जिस तरह पार्टी ने प्रदेशाध्यक्ष का चयन किया गया है, उससे मुख्यमंत्री के पास सत्ता और संगठन की असीम शक्तियां आ जाती हैं। अब तक दो उपचुनाव व स्थानीय निकाय चुनावों में उनकी राजनीतिक वास्तविकता पर कोई भी आंच नहीं आई है। यह दीगर है कि लोकतंत्र का असली समीक्षक तो आम मतदाता है, जो ऐन वक्त पर पाले बदल कर स्वतंत्र व निष्पक्ष फैसले देता है।

 सरकार के खिलाफ एंटी इंकमबैंसी का सही-सही मूल्यांकन होने में अभी वक्त है, लेकिन तीन दिशाओं में फैले उपचुनाव राजनीति की नई कहानी लिखने में सक्षम हैं। हिमाचल में अब तक के मुख्यमंत्रियों के पास असीम शक्तियां रही और इन्हें साबित करते हुए उनकी पकड़ प्रशासन से जनमानस तक रही है। जयराम ठाकुर इस मूल्यांकन में थोड़े से अलग दिखाई देते हैं, लेकिन उनकी कार्रवाइयों में अशांत सुर निद्रा में चले गए या उनकी स्थिति पतली हो गई। जयराम सरकार की संरचना में दिग्गज किशन कपूर, विपिन सिंह परमार, रमेश धवाला और दिवंगत नरेंद्र बरागटा कभी अपना स्थान हासिल नहीं कर सके। सत्ता लाभ के पदों पर मुख्यमंत्री की छवि की निजी मिलकीयत है या केंद्र की पटकथा में वह अहम किरदार पेश करते हैं। मुख्यमंत्री ने अपने किरदार की कुशल प्रस्तुति में अवश्य ही कुछ प्रयोग किए और इनमें जनमंच का अभिप्राय व कुछ हेल्प लाइन का मकसद पढ़ा जा सकता है। इन्वेस्टर मीट की तख्तियों पर जयराम कुछ ऐसा लिखना चाहते थे, जो उनके निजी आकार, संकल्प और इच्छा शक्ति का प्रतीक बनता, लेकिन कोरोना काल ने इसकी जमीन ही छीन ली। यह दीगर है कि उन्होंने अपनी वित्तीय मजबूरियों के बीच नए नगर निगमों का गठन और ऐसे ही कुछ फैसले लेकर पार्टी के पसंदीदा नेताओं की खुशामद की।

 शांता कुमार का नाम इस कड़ी में सबसे ऊपर आता है जिन्होंने बाढ़ में डूबे सौरभ वन बिहार और तीन हजार आबादी की नगर परिषद को एक ही झटके में नगर निगम बना दिया, लेकिन राजनीतिक तौर पर यह सौदा घाटे का ही रहा। हिमाचल के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के बीच बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार जैसी छवि का अवलोकन अगर करेें, तो वह ब्यूरोक्रेसी के जरिए आगे बढ़ रहे हैं। नितीश कुमार का यह हुनर उन्हें सात बार मुख्यमंत्री बना सकता है, तो हो सकता है जिस जयराम ठाकुर को हिमाचल की राजनीति पढ़ने की कोशिश कर रही है, वह शेष कार्यकाल में कुछ अलग कर दिखाएं। कोविड की दूसरी लहर में वह कुछ भिन्न दिखे और अपने कंधों पर सारा बोझ उठा कर चले भी, लेकिन अभी कारवां बनाना शेष है। ब्यूरोक्रेसी अगर नजदीक व उनके बाजुओं का करिश्मा है, तो इसे साबित करके ‘सुशासन बाबू’ बनने की तहरीर अभी बाकी है। कोविड काल का यह दौर राजनीति की ऐसी शर्तें लिख रहा है, जो अतीत से कहीं अलग नेताओं की काबिलीयत लिखेगा। यह परीक्षा अगर हिंदुत्व के मैदान पर उत्तर प्रदेश के सीएम योगी को कमजोर कर रही है, तो हिमाचल के मैदान में जयराम ठाकुर को अवसर भी दे रही है। देखें वह अपने पक्ष में वर्तमान हवाओं को कहां तक ले जा पाते हैं।