Tuesday, April 13, 2021 08:56 AM

खाकी वर्दी पहनना फूलों की सेज नहीं

रोजगार के अवसरों की कमी एक बहाना मात्र है। इंटरनेट और तकनीक के मेल से नई क्रांति आई है। यह सही है कि रोज़गार छिने हैं, नौकरियां गई हैं, लेकिन यह भी सच है कि नए ज़माने की आवश्यकताओं के अनुरूप हुनरमंद लोगों की मांग बढ़ी है और उनके वेतनमान में उछाल आया है। एक और सच यह भी है कि कोरोना के इस संकट के समय कई बड़े उद्योगपतियों ने दिल खोलकर सहायता की है। यह इसलिए संभव था कि उनके पास ऐसे किसी समय के लिए धन उपलब्ध था...

भारतीय राजनीतिज्ञ असमंजस में है। आर्थिक ऊर्जा शहरी क्षेत्रों में है जबकि वोट की ताकत ग्रामीण अंचल में है। शहरी क्षेत्रों के हिमायती नेताओं को लगभग हर चुनाव में मुंह की खानी पड़ती है, मगर वास्तविकता यह है कि दुनिया भर में आर्थिक विकास ने अंततः शहरीकरण को बढ़ावा दिया है। यह एक कड़वा सच है कि देश में अलग-अलग समय पर सत्ता में रहीं केंद्र सरकारें लोगों की आंखों में धूल झोंकते हुए बेरोज़गारी और गरीबी के गलत आंकड़े पेश करती रही हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि वर्तमान शासक भी इस खेल में उसी तरह से शामिल हैं। उससे भी ज्यादा खेदजनक तथ्य यह है कि ये आंकड़े एक निरर्थक बहस से मात्र बौद्धिक खुजलाहट का साधन बनकर रह जाते हैं, हमारे सामने कोई ऐसा समाधान नहीं आता जो समस्या को जड़ से दूर करने की नीयत से बताया गया हो। विभिन्न अध्ययनों से सिद्ध हुआ है कि देश के उन क्षेत्रों का तेजी से विकास हुआ है जहां औद्योगीकरण आया। किसी भी प्रदेश के जिन हिस्सों में उद्योगों की स्थापना हुई वहां ढांचागत सुविधाएं, शिक्षा सुविधाएं, सड़क, बिजली, पानी की सुविधाएं, बैंकिंग व्यवस्था, आवासीय व्यवस्था तथा शॉपिंग सुविधाओं आदि में तेजी से विकास हुआ है। इसके बावजूद एक सच यह भी है कि अक्सर स्थानीय लोगों द्वारा उद्योगों की स्थापना के कदमों का विरोध होता रहता है। आज हमें यह समझने की जरूरत है कि औद्योगिक विकास के कारण होने वाले धनात्मक बदलाव को सही परिप्रेक्ष्य में देखा जाए ताकि इस संबंध में पाली जा रही मिथ्या धारणाओं को तोड़ा जा सके।

 हाल ही में एनजीओ बुलंदी ने एक शोध किया जिसका उद्देश्य हिमाचल प्रदेश में सामाजिक ढांचागत सुविधाओं के विकास पर औद्योगीकरण के परिणामों पर लोगों के विचार जानना और उनका विश्लेषण करना था। इस अध्ययन में राज्य में आर्थिक ढांचागत सुविधाओं के विकास में औद्योगीकरण की भूमिका पर जनमत सर्वेक्षण के परिणामों का विश्लेषण भी शामिल था। सर्वेक्षण में भाग लेने वाले अधिकांश लोगों ने इस बात से सहमति जताई कि राज्य में ढांचागत सुविधाओं के आधुनिकीकरण में औद्योगिक विकास की बड़ी भूमिका रही है। परवाणू, बद्दी, काला अंब और पांवटा साहिब के निवासियों ने अधिकतर इस मत का समर्थन किया कि इन क्षेत्रों में उद्योगों की स्थापना से ढांचागत सुविधाओं के आधुनिकीकरण में मदद मिली है। ज्ञातव्य है कि हिमाचल प्रदेश पर्यावरण की दृष्टि से एक संवेदनशील राज्य है और लोगों की धारणा है कि विकास का हर प्रयास राज्य के समग्र संतुलन के लिए हानिकारक होगा। इसके विपरीत हमारे अध्ययन से यह साबित हुआ है कि उद्योगों के विस्तार ने राज्य में विकास की गति तेज की है। उद्योगों की स्थापना का यह मतलब कतई नहीं है कि वे संतुलन के लिए हानिकारक ही होंगे। इसके विपरीत उद्योगों के विकास से उन क्षेत्रों तथा स्थानीय लोगों के विकास की रफ्तार तेज हो सकती है। इन्फोसिस के चीफ  मेंटर श्री एनआर नारायण मूर्ति ने अपनी किताब ‘बेहतर भारत, बेहतर दुनिया’ में भी इसी तथ्य का समर्थन किया है कि शहरीकरण से विकास को गति मिली है और अर्थव्यवस्था बेहतर हुई है। भारतवर्ष ऋषियों-मुनियों का देश रहा है।

हमारे देश में मोह-माया के त्याग की बड़ी महत्ता रही है जिसके कारण धनोपार्जन को हेय दृष्टि से देखा जाता रहा है। ‘जब आवे संतोष धन, सब धन धूरि समान’ की धारणा पर चलने वाले भारतीयों ने गरीबी को महिमामंडित किया या फिर अपनी गरीबी के लिए कभी समाज को, कभी किस्मत को दोष दिया तो कभी ‘धन’ को ‘मिट्टी’ या ‘हाथों की मैल’ बता कर धनोपार्जन से मुंह मोड़ने का बहाना बना लिया। विडंबना यह थी कि ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ की धारणा का ढिंढोरा पीटने वाले राजनेताओं और अधिकारियों का काला धन देशी-विदेशी बैंकों में भरने लगा। उनके बच्चे विदेशों में पढ़े और आम जनता को टाट-पट्टी वाले स्कूल मिले। एक वर्ग विशेष की छोटी से छोटी बीमारी का इलाज विदेशों में होने लगा और जनसाधारण जीवनरक्षक दवाइयों के लिए भी तरसा। परिणाम यह हुआ कि सामान्यजन यह मानकर चलते रहे कि ‘जो धन कमाता है वह गरीबों का खून चूसता है।’ यानी धारणा यह बनी कि धन कमाना बुराई है।

नब्बे के दशक में पहला बदलाव तब आया जब उदारीकरण ने धन को एक बुराई मानने की प्रवृत्ति को बहुत हद तक समाप्त किया। उसके बावजूद जनमानस असमंजस में है। विरोधाभास यह है कि हममें से कोई निर्धनता में नहीं जीना चाहता, पर हम अमीरों को कोसने से भी बाज नहीं आते। हम संपन्नता चाहते हैं, पर इसके लिए जोखिम उठाने से डरते हैं। कैसी विलक्षण बात है कि दीवाली पर धूमधाम से लक्ष्मीपूजा करने वाले लोग अमीरों को कोसना भी अपना परम कर्त्तव्य मानते हैं। हमारी चुनौती यह है कि हम अपनी कमियों और सीमाओं को पहचानें, उस संसार के बारे में विचार करें जो हम बनाना चाहते हैं और उस संसार को बनाने के लिए त्याग और मेहनत करें। अपनी कमियों को स्वीकार करना उन्हें मिटाने की दिशा में पहला कदम होगा। यह रटते जाने का कोई लाभ नहीं है कि हम दुनिया का सर्वश्रेष्ठ देश हैं। कहने मात्र से भारत महान नहीं बनेगा, अपनी कमियों को पहचानने, उन्नत देशों की अच्छाइयों से सीखने और वैसा बनने के लिए मेहनत करने से ही हम एक आदर्श समाज की स्थापना कर सकते हैं। एक और महत्त्वपूर्ण तथ्य की ओर ध्यान दिलाना आवश्यक है। यदि आप विश्व की सौ सबसे बड़ी आर्थिक शक्तियों की सूची बनाएं तो पहले 63 स्थानों पर भिन्न-भिन्न देशों का नाम आता है और शेष 37 स्थानों पर आईबीएम, माइक्रोसॉफ्ट तथा पेप्सिको जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियां हैं।

 विश्व के शेष देश भी इन कंपनियों से बहुत छोटे हैं। इनमें से बहुत सी कंपनियां शोध और समाजसेवा पर नियमित रूप से बड़े खर्च करती हैं। इन कंपनियों के सहयोग से बहुत से क्रांतिकारी आविष्कार हुए हैं जो शायद अन्यथा संभव ही न हुए होते। तो भी, औद्योगीकरण के लाभ पर लट्टू हुए बिना इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि उद्योग से पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे और औद्योगीकरण के कारण विस्थापित लोगों के पुनर्वास और रोज़गार का काम भी साथ-साथ चले। रोजगार के अवसरों की कमी एक बहाना मात्र है। इंटरनेट और तकनीक के मेल से नई क्रांति आई है। यह सही है कि रोज़गार छिने हैं, नौकरियां गई हैं, लेकिन यह भी सच है कि नए ज़माने की आवश्यकताओं के अनुरूप हुनरमंद लोगों की मांग बढ़ी है और उनके वेतनमान में उछाल आया है। एक और सच यह भी है कि कोरोना के इस संकट के समय कई बड़े उद्योगपतियों ने दिल खोलकर सहायता की है। यह इसीलिए संभव था कि उनके पास ऐसे किसी समय के लिए धन उपलब्ध था। इसमें कोई दो राय नहीं कि सही सोच और नेतृत्व से सब कुछ संभव है। हमें इसी ओर काम करने की आवश्यकता है, ताकि हम गरीबी से उबर कर एक विकसित समाज बन सकें।

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वर्दी के टर्नआउट द्वारा यह पहचाना जा सकता है कि वर्दीधारी अपने कार्य में कितना संयमित, अनुशासित और तत्पर है। अतः प्रत्येक अधिकारी और कर्मचारी का टर्नआउट उच्च स्तर का होना चाहिए। इससे जवान का मनोबल बढ़ता है, साथ ही साथ पुलिस विभाग की जनता में छवि सुधारने में भी सहयोग प्राप्त होता है...

पुलिस विभाग में वर्दी पथ-प्रदर्शक की सौम्य भूमिका निभाती है तथा वर्दीधारी के अस्तित्व की प्रतीति के सत्य को आंतरिक गहराई तक हृदयंगम करती है। अनीति एवं अव्यवस्था की चुनौती के समक्ष सतत संघर्ष व बलिदान ऐसी परिष्कृत चेतना का उत्थान करती है। पुलिस बल के लिए वर्दी ऐसा तोरणद्वार है जिसके माध्यम से वर्दीधारी समाज में अनाचार बढ़ने तथा सज्जनता के घटने की स्थिति में अपने प्रदत्त दायित्वों के दक्षतापूर्ण निर्वहन में प्रवेश पाते हैं। आम आदमी के मानसपटल पर वर्दी पहली ही झलक में व्यक्ति के विभाग, व्यवसाय, पद, आचार तथा अस्तित्व का अनायास ही परिचय करवा देती है। वर्दी, अनुशासन, परस्पर सहकार, समन्वय, तत्परता व समयबद्धता जैसे अनिवार्य तत्वों को अंकित करती है तथा पुलिसकर्मी पर आंतरिक सुरक्षा तथा सुचारू कानून व्यवस्था की संवेदनशील जिम्मेदारी सौंपती है जिसे प्रत्येक कर्मचारी को अपनी जान की बाजी लगाकर भी अपने कर्त्तव्यपालन को करना होता है। वर्दी शौर्य, पौरुष तथा विवेकरूपी मानव प्रेम की वह त्रिवेणी है जो निर्धारित कानूनों का दुरुपयोग करने वाले सत्ताधारी, पूंजीपति माफिया तथा सामाजिक व आर्थिक-राजनीतिक बाहुबलियों तथा उनके चेले-चपाटों के समक्ष यदा कदा बौना महसूस करते हुए पुलिस प्रशासन को उनके मूलभूत उद्देश्य के प्रति सचेत व जागरूक करने में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। वर्दी को देखकर एक तरफ  तो खूंखार अपराधी को डर लगता है, वहां दूसरी तरफ कमज़ोर, पीडि़त व बेसहारा व्यक्ति वर्दी से संरक्षण, सुरक्षा एवं शरणस्थली तलाशता है।

निःसंदेह पुलिस का मुख्य कार्य अपराधियों को सलाखों के पीछे पहुंचाना है तथा दुष्टों पर शिकंजा कसना है। लेकिन जब उस अपराधी ने खद्दर का सफेद कवच पहन रखा हो या फिर वह स्वयं सत्ताधारी बन कर अपने जायज़-नाजायज़ आदेशों की पालना के लिए बाध्य करता हो तो ऐसे विकट समय में वर्दी रूपी आत्म तत्व ही पुलिस कर्मी के कर्त्तव्य धर्म की पालना हेतु एक सच्चा सृजन सैनिक बन कर अपने कर्त्तव्य निर्वहन करने के लिए प्रेरित करता है। वर्दी से ऐसा तन-मन का बल मिलता है मानो किसी डायनमों से संग्रहित व संरक्षित किया गया हो। ये संचित शक्ति ही वह वर्दी रूपी मेरूदंड है जिसकी भिती पर यह पुलिस का विशाल भवन खड़ा है। वर्दी का खाकी वर्ण ऐसा साधुबीज है जो पुलिस संस्था को अन्य सरकारी संस्थाओं से भिन्न और विशिष्ट बनाता है। खाकी वर्ण का अंतरंग महत्व एक महत्वपूर्ण गरिमा को संजोए हुए है। खाकी वर्ण पुलिस तंत्र को अपने कर्त्तव्य के लिए खाक तक में मिल जाने की उदात्त भावना की अपेक्षा को अंकित करता है। खाकी वर्दी पहनना फूलों की सेज नहीं है। इस पुलिस पथ पर हर पग पर चुभने वाले ढेरों कांटे कदम-कदम पर बिछे हैं। पुलिसकर्मी को नंगी तलवार पर चलना पड़ता है जो दोनों तरफ  से काटती है। इसलिए हर पुलिसकर्मी को सदैव चौकन्ना व सतर्क रहना चाहिए। जाने एवं अनजाने में कोई भी ऐसा कुकृत्य न करें जिससे वर्दी की गरिमा खाक में मिल जाए।

एक पुलिस कर्मी की गलती समस्त पुलिस समाज को बदनाम कर देती है और लोग कह उठते हैं, ‘खाकी कुत्ते मारो जूते’। पुलिस कर्मियों को सदैव याद रखना चाहिए कि केवल अधिकार के दम पर अपराधों को नहीं रोका जा सकता। इसी तरह धनाढ्य लोगों या फिर राजनीतिज्ञों के आगे अपने स्वार्थ के लिए घुटने टेक देना पुलिस की गरिमा को कलंकित करता है। पुलिसकर्मी को नहीं भूलना चाहिए कि जिन्होंने अपनी आत्मा को बेच दिया हो वे ही खरीददारों द्वारा खरीदे जाने के लिए खोजे जाते हैं, लेकिन सिंह खरीदे नहीं जाते क्योंकि वो बिकाऊ नहीं होते। खाकी वर्दी तो उच्चाकांक्षा से अपने अंदर छिपे हीरे को खोजने, तराशने तथा हर चुनौती का सामना करने की प्रेरणा देती है। पुलिस कर्मी को अर्जुन के समान सृजन सैनिक बनकर आतताइयों और दुराचारियों का मुकाबला करना चाहिए। पुलिस वर्दी का असली बल वर्दीधारी की जमीर होती है तथा यह इसलिए भी है कि जब पुलिसकर्मी अपने कार्यान्वयन हेतु जनता के बीच जाता है तो कानून प्रदत्त उसकी शक्तियों के साथ-साथ उसका व्यक्तिगत व्यवहार एवं चरित्र चिंतन उसके कार्यों के माध्यम से झलकता है और वह झलक राष्ट्र में अपनी अमिट छाप छोड़ती है। पुलिस कर्मी का बाहरी लिबास और जो भी विशेष परिधान अर्थात वर्दी, खाकी रंग वाली, स्वच्छ, धुली हुई, खिली खिली, इस्त्री की हुई, चुस्त-दुरुस्त, स्मार्ट वर्दी वाले बांके बलिष्ठ जवान में गजब का अकर्षण तो पैदा करती ही है, मगर इसके साथ-साथ वर्दी की आंतरिक पवित्रता रूपी शुचिता, जमीर को अपने आचार एवं व्यवहार में लाकर वर्दी की बहुमुखी गरिमा को लोगों के सामने भी प्रकट करती है।

जब जवान का शरीर, वस्त्र, चित्त, मन और आत्मा आध्यात्मिक संवेदना से युक्त होकर अपनी कर्मस्थली पर उतरती है तो उसकी वर्दी राष्ट्र एवं मानव मात्र की उज्ज्वल सुरक्षात्मक आशा का प्रतीक बनती है। मगर कुछ पुलिस कर्मी अपनी वर्दी को आम लिबास की तरह ही पहन लेते हैं तथा उनको देख कर अपराधी व शातिर लोग और भी सक्रिय हो जाते हैं। स्थिति तो उस समय हास्यप्रद व आश्चर्यजनक हो जाती है जब कुछ पुलिस कर्मी शराब के नशे में धुत्त होकर सड़कों पर गिरे पड़े मिलते हैं तथा कुत्ते उनके चेहरे व मुंह को चाट रहे होते हैं। ऐसे में संपूर्ण विभाग सवालों के घेरे में आ जाता है तथा पुलिस का चेहरा दागदार हो जाता है। एक पुलिस अधिकारी की ऐसी लापरवाही समस्त पुलिसबल की बदनामी का कारण बन जाती है। वर्दी के टर्नआउट द्वारा यह पहचाना जा सकता है कि वर्दीधारी अपने कार्य में कितना संयमित, अनुशासित और तत्पर है। अतः प्रत्येक अधिकारी और कर्मचारी का टर्नआउट उच्च स्तर का होना चाहिए। इससे जवान का मनोबल बढ़ता है, साथ ही साथ पुलिस विभाग की जनता में छवि सुधारने में भी सहयोग प्राप्त होता है। वर्दी पहनकर कुछ अहंकार आना भी स्वाभाविक है। कुछ पुलिस कर्मचारी तो सहज ही मान लेते हैं कि उनकी साख बहुत है, उनके अधिकार क्षेत्र असीमित हैं तथा वे अभद्र व्यवहार करने से पीछे नहीं रहते। ऐसे व्यवहार से वो अपनी चमकदार वर्दी को दागदार बना लेते हैं जिसके धब्बे मिटाने से भी नहीं मिटते। पुलिस जनों को दसवीं पातशाही गुरू गोबिंद सिंह जी की इस वाणी से प्रेरित होकर अपने कार्य का निर्वहन करना चाहिए ः ‘देह शिवा वर मोहे, शुभ कर्मन ते कबहुं न टरों न डरो अदि सौं, जब जाय लड़ौ, निश्चय कर अपनी जीत करौ।’