Tuesday, June 15, 2021 01:02 PM

तोल-मोल के बोल

बिल गेट्स और मिलिंडा गेट्स ने माइक्रोसॉफ्ट जैसी दैत्याकार कंपनी का नेतृत्व किया है। लोगों को समझना और उन्हें अपनी बात समझाना उन्हें खूब आता है। इसके बावजूद वे अपने जीवन साथी को ही अपनी बात नहीं समझा पाए। इसका एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक कारण है। जब हम अपने किसी कर्मचारी से बात करते हैं तो हम औपचारिकता का ध्यान रखते हैं। आपसी रिश्तों में इसकी जरूरत नहीं महसूस होती और अक्सर हम जाने-अनजाने अपने साथी की भावनाएं आहत कर बैठते हैं...

हम सब इस बात के गवाह हैं कि ब्रिटेन के राजकुमार प्रिंस चार्ल्स से शादी करके शाही घराने की बहू बन जाने के बाद भी डायना खुश नहीं रहीं और न केवल उनका तलाक हुआ बल्कि विवाद भी दुनिया के सामने आया। कुछ साल पहले संपत्ति के बंटवारे को लेकर रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के मालिक दो सगे भाइयों मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी का तमाशा भी अखबारों की सुर्खियां बना रहा। एमेजॉन के मालिक जेफ बोजेस ने कस्टमर रिलेशनशिप पर बड़े-बड़े लेख लिखे जो दुनिया भर में सराहे गए। रिलेशनशिप की बातें करने वाले इस महागुरू का अपना वैवाहिक जीवन दो साल पहले टूट गया, वह भी तब जब जेफ बोजेस दुनिया के सर्वाधिक अमीर व्यक्ति हैं। दुनिया भर में अमीरी की पायदान में दूसरे स्थान पर एलेन मस्क और तीसरे स्थान पर बर्नाड अर्नाल्ट हैं। इस सप्ताह के पहले ही दिन, यानी सोमवार 3 मई को दुनिया के चौथे सबसे अमीर व्यक्ति बिल गेट्स के तलाक की घोषणा हुई है। बिल गेट्स और मिलिंडा गेट्स ने अलग-अलग ट्वीट करके दुनिया को अपने इस फैसले की जानकारी दी। अलगाव की इन दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का क्या मतलब है? एक, पैसा खुशी नहीं दे सकता, सुख दे सकता है, सुविधा दे सकता है, खुशी नहीं दे सकता। दो, पैसा होने के बावजूद दसियों नौकरों और हजारों कर्मचारियों के बावजूद, सभी संपर्कों और अथाह धन के बावजूद हमारे रिश्तों में दरार आ सकती है। क्या इसका कोई इलाज है? जी हां, है। बिलकुल है। इसे कारपोरेट भाषा में सहृदय पूंजीवाद कहा गया, व्यक्तिगत जीवन में मैं इसे सहृदय समृद्धिवाद कहता हूं।

 कंपैशनेट वैल्दीनेस, यानी वो समृद्धि जो दुनिया का भला करने के बारे में सोचे, वो समृद्धि जो अपने आसपास के लोगों के दुख-दर्द में शामिल हो, वो समृद्धि जो अपने आसपास के लोगों के प्रति संवेदनशील हो। सहृदय समृद्धिवाद या कंपैशनेट वैल्दीनेस से मेरा मतलब यह है कि व्यक्ति को इतना हुनरमंद होना चाहिए कि वह अपनी जरूरतें पूरी कर सके, अपनी सुख-सुविधाओं का इंतज़ाम कर सके और उसके बावजूद समाज के भले के लिए भी उसके पास साधन हो। पैसा बुरा नहीं है। पैसा जीवन की सच्चाई है। पैसे से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। हमें इतना शिक्षित होना, इतना हुनरमंद होना ही चाहिए कि हम गरीबी और अभावों से परेशान न हों। सांस अंदर लेंगे तभी तो सांस बाहर छोड़ेंगे। धन होगा तभी तो किसी दूसरे को दे सकेंगे, उसके लिए पहले खुद समृद्ध होना आवश्यक है। ध्यान सिर्फ यह रखना है कि जीवन में हमारा उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना ही न रह जाए, जीवन उससे पहले आए, परिवार उससे पहले आए, हम खुद उससे पहले आएं। लेकिन यह सिर्फ  एक पहलू है। एक दूसरा पहलू इससे भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। एक लड़की जब किशोरी होती है तो उसकी सोच शिक्षा और अपने माता-पिता और भाई-बहनों तक सीमित होती है। युवा हो जाने पर वह करिअर के बारे में भी सोचने लगती है। शादी हो जाने पर वही लड़की जब बहू बनती है तो उसकी विचारधारा में बड़े परिवर्तन आते हैं। पहली बार मां बनने के बाद उसके विचार कुछ और बदलते हैं। चालीस-पैंतालीस की उम्र पर विचारों में फिर परिवर्तन आता है और सास बन जाने पर सोच एक बार फिर बदलती है। एक ही लड़की के जीवन में अलग-अलग स्थितियों में विचारधारा में परिवर्तन होता है। जरूरतें बदल जाती हैं तो सोच भी बदल जाती है। अक्सर हम यह नहीं समझ पाते कि एक ही व्यक्ति इतना क्यों बदल गया, क्योंकि हम इस बात पर ध्यान नहीं देते कि समय के साथ-साथ जरूरतें बदली हैं तो सोच भी बदलेगी ही। रिश्तों में गड़बड़ी की शुरुआत यहीं से होती है। बिल गेट्स और मिलिंडा गेट्स का तलाक मशीनी सोच की असफलता का जीता-जागता प्रमाण है।

 बिल गेट्स माइक्रसॉफ्ट के सह-संस्थापक हैं। मिलिंडा गेट्स उन्हीं की कंपनी में मैनेजर थीं। काम के सिलसिले में एक मीटिंग के दौरान बिल गेट्स को मिलिंडा पसंद आ गईं और फिर दोनों में इस विषय पर बातचीत हुई। दोनों ने अपने-अपने सपनों की बात की और यह पाया कि उनके सोचने का तरीका, भविष्य के जीवन के बारे में सोचने का तरीका मिलता-जुलता है और वे आदर्श दंपत्ति हो सकते हैं। इस मनोवैज्ञानिक और मैनेजीरियल एक्सरसाइज़ के बाद दोनों विवाह बंधन में बंध गए। उनका विवाह 27 साल चला और 27 साल के बाद जब उन्हें यह महसूस हुआ कि अब दोनों की जरूरतें बदल गई हैं, सोचने का तरीका बदल गया है, सपने बदल गए हैं तो दोनों ने अलग होने का निर्णय ले लिया। यह कोई अचानक नहीं हो गया है। दुनिया को इसकी खबर अचानक लगी है, पर रिश्ते एक रात में नहीं सूख जाते। उनमें धीरे-धीरे गर्माहट कम होती चलती है और आरामदायक गर्माहट के बजाय निराशा, हताशा और गुस्से की आग भरनी शुरू हो जाती है। परिणाम यह होता है कि एक दिन दोनों यह समझ जाते हैं कि उनका रिश्ता अब उन पर बोझ है। बिल गेट्स और मिलिंडा गेट्स ने माइक्रोसॉफ्ट जैसी दैत्याकार कंपनी का नेतृत्व किया है। लोगों को समझना और उन्हें अपनी बात समझाना उन्हें खूब आता है। इसके बावजूद वे अपने जीवन साथी को ही अपनी बात नहीं समझा पाए। इसका एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक कारण है। जब हम अपने किसी कर्मचारी से बात करते हैं, वरिष्ठ अधिकारी से बात करते हैं, ग्राहक से बात करते हैं या किसी अनजान व्यक्ति से बात करते हैं तो हम औपचारिकता का ध्यान रखते हैं। आपसी रिश्तों में औपचारिकता की आवश्यकता नहीं महसूस होती और अक्सर हम जाने-अनजाने अपने साथी की भावनाएं आहत कर बैठते हैं।

 और ऐसा जब लंबे समय तक चलता है तो कहानी तलाक पर जाकर खत्म होती है। अक्सर हम यह नहीं समझ पाते कि सामने वाले को हमारे शब्दों से भी ज्यादा चोट हमारी टोन और हमारे हाव-भाव ने पहुंचाई है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि हमारे शब्दों का असर होता है, शब्दों के चुनाव से फर्क पड़ता है, पड़ता ही है, पर उससे कहीं ज्यादा फर्क इस बात से पड़ता है कि बोलते समय हमारी टोन कैसी थी, उसमें व्यंग्य था, गुस्सा था, हिकारत थी या प्यार था। इसी तरह बोले गए शब्दों से भी ज्यादा फर्क इस बात से पड़ता है कि जो कह रहे हैं, उसे कहते हुए हमारे हाव-भाव कैसे थे। हमारी बॉडी लैंग्वेज और हमारी टोन, इनका असर बहुत गहरा है। शब्दों से भी ज्यादा। अफसोस की बात यह है कि आपसी रिश्तों में हम इसी बात का ध्यान नहीं रखते और स्थिति विस्फोटक होती चलती है, परिणामस्वरूप जब ज्वालामुखी फटता है तो सारा लावा जब बाहर निकलता है रिश्ते चटक जाते हैं। तोल-मोल के बोल का महत्त्व इसीलिए है। यहां कोई गुणा-भाग नहीं चलता, गणित नहीं चलता, भावनाएं चलती हैं। इसलिए यह ध्यान रखना जरूरी है कि हम तोल-मोल कर बोलें ताकि रिश्तों की गर्मी बरकरार रहे और जीवन शांतिपूर्ण बना रहे।

संपर्क :

पी. के. खुराना

राजनीतिक रणनीतिकार

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