Tuesday, November 30, 2021 08:06 AM

विकास किसे कहें

हिमाचल प्रदेश के उपचुनाव अपने सहज भाव को प्रचार की अति में झेलते हुए, ऐसे मुद्दों को लिख रहे हैं, जो प्रायः बहस का विषय नहीं बनते। अब कांग्रेस बनाम भाजपा के बीच विकास अड़ गया है। सवाल विपक्ष जिस लहजे में पूछता है, उससे भिन्न विकास का प्रति उत्तर सत्तारूढ़ दल दे रहा है। इनका विकास, उनका विकास आखिर राज्य का विकास कब होगा। कब हम विकास की निरंतरता में सियासी जोखिम को दरकिनार करेंगे। स्वयं मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर भी विकास की परिपाटी में उपचुनावों को तोल रहे हंै, तो स्वाभाविक रूप से विपक्ष की नजरों में इसकी आना-पाई हो रही है। यानी कांग्रेस उपचुनावों के दाने चुनते हुए यह देख रही है कि मंडी का विकास कांगड़ा के फतेहपुर, सोलन के अर्की या शिमला के जुब्बल-कोटखाई विधानसभा क्षेत्रों में एक जैसा नहीं है। अब सवाल यह है कि अगर हिमाचल का विकास नहीं हुआ, तो विकास किसे कहते हैं। हिमाचल ने केरल और तमिलनाडु के साथ संयुक्त राष्ट्र के समावेशी विकास लक्ष्यों को हासिल किया है। नीति आयोग 2030 तक सभी राज्यों में विकास के फलक पर सामाजिक तरक्की का आकलन कर रहा है, जहां हिमाचल ने पेयजल आपूर्ति, स्वच्छता, असमानता खत्म करने तथा पर्वतीय ईको सिस्टम के संरक्षण में उल्लेखनीय उपलब्धि  हासिल की है।

 इसी साल सितंबर में आई रिपोर्ट बताती है कि विकास के मानदंडों में केरल 75 अंक लेकर सबसे आगे है, तो हिमाचल 74 अंकों के साथ दूसरे स्थान पर तमिलनाडु की बराबरी पर है। राष्ट्रीय स्तर के कमोबेश हर मूल्यांकन में हिमाचल की तस्वीर उज्ज्वल दिखती है, फिर भी सवाल विकास की भूमिका में जीवन का उत्थान तो बना रहेगा। दूसरी ओर यह भी कहा जा सकता है कि हिमाचल की राजनीतिक परीक्षा में विकास दिखाई जरूर देता है, लेकिन चुनाव के अंकगणित  में वर्ग और जातियां ही देखी जा रही हैं। हिमाचल में विकास के मसीहा पिछले चुनावों में भी हारे, तो सवाल यह कि विकास किसे कहते हैं और हिमाचल में समावेशी विकास की परिकल्पना है क्या। योजनाएं-परियोजनाएं हर बार सत्ता परिवर्तन के साथ हाथ-मुंह धोती हुई नजर आती हैं। विकास में निरंतरता का अभाव कई शिलान्यासों को वर्षों से अपमानित कर रहा है, तो भवनों की कतार में अप्रासंगिक होते उद्देश्य भी देखे जाते हैं। उन स्कूलों में विकास कैसे चमक सकता, जहां पढ़ने को छात्र तक नहीं या जहां पढ़ाने को माकूल अध्यापक नहीं, उन संस्थानों को विकास का मानदंड कैसे मानें। विकास की तरफदारी तो हमेशा होगी, लेकिन इमारतों का झुंड अगर दायित्व से भ्रमित रहे तो विकास के शिलालेख क्या करेंगे।

 प्रदेश के कई जिलाधीश कार्यालय परिसरों में अगर इमारतों पर पौधे उगे हैं, तो विकास की हर ईंट बेमानी है। आश्चर्य यह भी कि विकास के सामने वन एवं पर्यावरण संरक्षण मंत्रालय अपनी अडि़यल भूमिका में दिखाई देता है, लेकिन इस परिस्थिति के निवारण को लेकर कभी कोई संघर्ष दिखाई नहीं दिया। विकास बनाम पर्यावरण संरक्षण या तरक्की बनाम जंगल के इस खेल में हिमाचल के प्रति केंद्रीय नाइनसाफी का जिक्र तक नहीं होता। पूरे देश में वन क्षेत्र 21.23 प्रतिशत है जबकि हिमाचल में यह दर 68 फीसदी बैठती है। यानी राष्ट्र अपनी उम्मीद के मुताबिक 33 प्रतिशत जमीन पर भी पेड़ नहीं उगा पाया, जबकि हिमाचल को अपनी आर्थिक-सामाजिक तरक्की व विकास के लिए मात्र 32 फीसदी जमीन ही उपलब्ध है। हमारे मुकाबले पंजाब में 3.52 प्रतिशत जबकि हरियाणा 3.59 फीसदी जमीन पर ही जंगल हैं। यह कैसा विकास जो पंजाब-हरियाणा को तो आगे बढ़ने के लिए 96 प्रतिशत जगह छोड़ता है, जबकि हिमाचल खुद को आगे बढ़ाने के लिए 32 प्रतिशत जमीन पर निर्भर करता है। विकास का एक दूसरा पहलू भी हिमाचल को समझाना होगा। पर्यटन उद्योग के दायरे में बढ़ता यातायात दबाव आम नागरिक के लिए असुविधाजनक है। प्रदेश को पर्यटक सीजन में आम नागरिक की सुविधाओं के लिए भी खाका मुकर्रर करना होगा, तो विभिन्न पर्यटक शहरों को एनजीटी की काली छाया से मुक्त कराने की तरकीब ढूंढनी होगी। हिमाचल में विकास को जरूरतों के मुताबिक, भौगोलिक परिस्थितियांे के अनुरूप और भविष्य की हिदायतों के अनुसार चलना है, तो इसके लिए नीति व नियम निर्धारित करने के साथ-साथ राज्य की एकरूपता में नए मानदंड स्थापित करने होंगे, वरना हर बार विपक्ष के लिए क्षेत्रवाद का मुद्दा ढूंढना कठिन नहीं होगा।