Monday, October 18, 2021 03:40 PM

इतनी फ़कीरी कहां से पाई

दुष्यंत का शे’र, ‘‘मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ, वो ़गज़ल आपको सुनाता हूँ’’, गुनगुनाते हुए मियाँ फुम्मन ने मियाँ जुम्मन के सामने सवाल उछाला, ‘‘क्या फ़कीरी को दुष्यंत की गज़ल की तरह ओढ़ा-बिछाया जा सकता है?’’ जुम्मन हँसते हुए बोले, ‘‘अमाँ! कितने लोग ऐसे हैं, जो वही ओढ़ते-बिछाते होंगे, जो वे सोचते हैं। ओढ़ने-बिछाने को लेकर मुझे दुष्यंत पर भी संदेह है कि उन्होंने यह शे’र पूरे होशो-हवास में लिखा होगा। जो ऊपर से आता है, आदमी कह तो जाता है लेकिन उसके जीवन में कहाँ उतर पाते हैं, वे तमाम जज़्बात, एहसासात और ़फलस़फे, जिनकी बयानी वह अपनी रचनाओं में करता फिरता है। मुझे तो साहित्यकार और ठूँठ एक जैसे नज़र आते हैं। बस फ़र्क इतना है कि ठूँठ होने के बावजूद साहित्यकार फलों से लदा दिखाई देता है। मियाँ, फ़कीरी ऐसा बाना है, जिसे ओढ़ने-बिछाने की ज़रूरत नहीं होती। मन से ़फ़कीर होना और फ़कीरी दिखाने में उतना ही फासला है, जितना मधुबाला और राखी सावंत की खूबसूरती में। एक चेहरे पर मेकअप मेन को मेकअप करने की जगह नहीं दिखती थी और दूसरे चेहरे पर कोई छूटती नहीं। पर सच तो सच है उजाले की तरह।

 लाख कोशिशों के बावजूद अमावस का चाँद पूर्णमासी का चाँद नहीं बन पाता। चिढ़ाने लगता है जबकि फ़कीरी गुलाब की तरह महकती रहती है। फ़कीरी चाँदी का चम्मच लेकर पैदा होने के बावजूद फ़कीर ही रहती है। हाँ, कबीर या रैदास होना और भी मुश्किल है। नहीं तो आदमी चाहे मखमल में लिपट कर दुनिया देखे या चीथड़ों में, रहेगा लाल बुझक्कड़ ही।’’फुम्मन ने अगला प्रश्न उछाला, ‘‘इसका अर्थ है कि फ़कीरी पूर्णिमा के चाँद की तरह खुद-ब़खुद नज़र आती है?’’ जुम्मन बोले, ‘‘फ़कीरी स्वभाव है न कि चीथड़ों में जीना। रेशमी वस्त्र पहनने वाला फ़कीर हो सकता है और चिथड़ों में लिपटा भूखा बादशाह। फ़कीरी का सबसे बड़ा गुण है निडर होना। मन्सूर, कबीर, मीरा व़गैरह ने जो किया और कहा, वही जिआ, बिना किसी लाग-लपेट के। चाहे कोई शीश उतारे या ज़हर पिलाए। इधर तो उद्घोषित फ़कीर सलवार पहन कर पतली गली से निकलने की कोशिश में पकड़े गए या देवी पूजन करते धरे गए या यमुना के तट पर गलत तरी़के से सत्संग। उद्घोषित फ़कीर प्रेस कॉन्फ्रेस से ऐसे डरते हैं जैसे बिल्ली से चूहा।

 हाँ, अपने ठीहे पर ऐसे लोग 11 लाख वोल्ट करंट के तार भी कुतर देते हैं। ़फ़कीरी आत्मा-मुग्ध होती है न कि आत्ममुग्ध। उसे गु़फा में ध्यान मुद्रा में बैठकर फोटो सैशन करवाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। फ़कीरी कभी सार्वजनिक मंचों पर नहीं नाचती, उसे महिमा दिखाने के लिए िफल्में नहीं बनानी पड़ती, वह रॉयल रोल्स में नहीं घूमती, न जंगल उजाड़ कर अपने आश्रम बनवाती है, उसे आस्तीन से भभूत या मुँह से शिवलिंग व़गैरह निकालने जैसे चमत्कारों की ज़रूरत होती है न ढोलकी-चिमटा बजाने की। उसे बैठने के लिए ऊँचे आसनों या सोने के सिंहासनों की आवश्यकता नहीं होती, न लच्छेदार प्रवचनों की या किसी विशेषण की। उसके लिए झोला उठाने की ज़रूरत नहीं होती। अगर फ़कीरी झोले में आ सकती तो मार्केटिंग की ज़रूरत नहीं पड़ती। ़फ़कीरी आई़फोन से ट्वीट नहीं करती, रेंज रोवर कार से बाहर नहीं आती, कैनेथ कोल जूतों में नहीं घूमती, जिऑरजिओ अरमानी सूट के ठप्पों में नहीं छिपती, कूपर के चश्मों से बाहर नहीं झाँकती, व़क्त के लिए मोवाडो घड़ी नहीं देखती, प्रचार के लिए स्टूडियो से ‘मन की बात’ की बात नहीं करती। वह तो पहले खुद गुड़ खाना छोड़ने के बाद दूसरों को गुड़ न खाने की नसीहत देती है। फ़कीरी बोलती है न कि फ़कीर।’’ इतना सुनने के बाद फुम्मन मियाँ फिर गुनगुनाने लगे थे, ‘‘तू नी बोलदी, रकाने, तू नी बोलदी, तेरे च तेरा यार बोलदा, तेरा यार बोलदा......।’’

पी. ए. सिद्धार्थ

लेखक ऋषिकेश से हैं