Friday, September 24, 2021 08:02 AM

भाजपा का वीरभद्र कौन

वीरभद्र सिंह ने राजनीतिक इतिहास के न केवल अहम पल चुराए, बल्कि भविष्य की तासीर में खुद को पढ़ाने की वजह भी छोड़ गए। हिमाचल की सियासत उन्हें पढ़े बिना अधूरी रहेगी और यह केवल कांग्रेस के लिए नहीं, तमाम राजनीतिक दलों के लिए एक ऐसी इबारत है जिसे बार-बार पढ़ना होगा। आखिर क्यों वह एक बड़ा हुजूम छोड़ गए और उनके अंतिम दर्शन के लिए उमड़ी भीड़ ने बता दिया कि राजनीतिक हस्तियां भी जनता के बीच अपनी खास जगह रखती हैं। ऐसा क्या है जो केवल वीरभद्र सिंह कर गए या ऐसा क्या है जिसे हिमाचल की वर्तमान राजनीति नजरअंदाज कर रही है। वीरभद्र सिंह ने हिमाचल की भौगोलिक अपेक्षाओं, राजनीतिक संतुलन और विकास की मीमांसा के आगे स्वयं को तत्पर रखा। वह वास्तव में राजनीति के ऐसे चित्रकार थे, जो पूरे हिमाचल को अपनी तूलिका से रंगते रहे। उनके बाद कांग्रेस अपनी जमीन पर खुद को कितना अनाथ पाती है, लेकिन इसमें दो राय नहीं कि हिमाचल के कई इलाके और कई नेता अवश्य ही अपने पालक को खोने का दर्द महसूस करेंगे। आज कांग्रेस के भीतर राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा और युवा तुर्कों की ओर देखेंगे, तो हर लक्षण और संभावना में वीरभद्र सिंह की विरासत दिखाई देगी। प्रश्न यह है कि पार्टी के अगले कदमों में कितनी शिद्दत से कोई और वीरभद्र सिंह निकल आएगा।

 विडंबना भी यही है कि नेताओं को अपनी किस्मत परखने के लिए बस एक सीमित सा क्षेत्र जिसे विधानसभा कहते हैं, चाहिए। इसलिए आगामी पीढ़ी के नेताओं का प्रादेशिक दर्जा घट रहा है। हर जिला चाहता है कि अगला मुख्यमंत्री वहीं का हो। हर जाति चाहती है कि विधानसभा में उसी का राज हो। यह सोच का तिलिस्म है जो प्रदेश को वैचारिक तौर पर अति संकीर्ण बना रहा है। इसलिए जब शांता कुमार जैसे कद के व्यक्ति महज पालमपुर नगर निगम निर्माण के दांव पेंच में उलझ जाते हैं, तो राज्य निर्माण की विचारधारा नहीं बचती। जब मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री या राज्य के मंत्रियों से अपेक्षा के दायरे सीमित होने लगें, तो कौन आकर हिमाचल की संपूर्णता में आगे बढ़ेगा। फिलहाल सत्ता के तीन पुरोधा इस वक्त हिमाचल को नए आयाम दे सकते हैं। बतौर मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की सौम्यता और व्यवहार कुशलता अगर आगे बढ़कर पूरे प्रदेश की छवि में निखार लाना चाहती है, तो उन्हें इलाकाई अंदाज से कहीं आगे बढ़ कर प्रदेश का चप्पा-चप्पा छानना होगा। दरअसल वीरभद्र सिंह जिस तरह ‘सी एम ऑन व्हील्स’ रहे, उस तरह का  परिचय जयराम की सादगी को आगे बढ़ा सकता है। दूसरे शिखर पर पहुंचे केंदीय मंत्री अनुराग ठाकुर के पास उसी तरह का समय व स्पेस है, जिस तरह वीरभद्र सिंह का पदार्पण हुआ था। अनुराग ठाकुर के लिए पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल की विरासत का एक पहिया है, लेकिन दूसरा उन्हें खुद जोड़ना है। यह विडंबना भी हो सकती है कि लोग उनके भीतर धूमल साहब की लोकप्रियता देखने लगें या यह उनके व्यक्तित्व की क्षमता का गठजोड़ भी हो सकता है।

बेशक वह क्रिकेट जगत में एक नामचीन चेहरा रहे या अब बतौर खेल मंत्री इसी क्रम की अगली पायदान पर हैं, लेकिन राजनीति दो-चार चौके-छक्के नहीं और न ही कोई मंत्री पेज थ्री की छवि में जमीन से जुड़ सकता है। हिमाचल का धरती पुत्र बनना है, तो उन्हें अपने भीतर देश नहीं, प्रदेश का चरित्र और पिछले कई मुख्यमंत्रियों की अदाकारी को भी ओढ़ना होगा। हिमाचल का सबसे बड़ा धु्रव इस समय भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के साथ खड़ा होना चाहता है, लेकिन क्या वह राज्य की छवि में एक अलग नड्डा नजर आएंगे। इसमें दो राय नहीं कि उनके प्रश्रय में जयराम ठाकुर का मुख्यमंत्रित्व स्थिर व स्थायी है। दूसरी ओर राज्य से कैबिनेट मंत्री की पायदान पर पहुंचे अनुराग ठाकुर भी उनकी सूची से स्वीकृत हुए हैं। इसलिए नड्डा एक साथ मुख्यमंत्री से राज्य के केंद्रीय मंत्री तक का कोटा निर्धारित कर रहे हैं। कल या विधानसभा चुनाव आते-आते नड्डा की बागडोर में भाजपा की ओर से हिमाचल की नई पौध तैयार हो सकती है। क्या नड्डा इस अवसर की नजाकत को अपने राजनीतिक जीवन की अहमियत से जोड़ पाएंगे। बेशक राष्ट्रीय स्तर पर इस वक्त वह जिसे छू भर दें, उसका करियर बदल सकता है, लेकिन हिमाचल में उनका यह अंदाज क्या वीरभद्र सिंह की तरह करामाती हो सकता है। वीरभद्र सिंह भले ही कांग्रेस के झंडे में लिपट कर अलविदा कह गए, लेकिन भाजपा को अपने भीतर कोई तो वीरभद्र चाहिए।