Monday, October 18, 2021 04:49 PM

मानविकी विषयों के प्रति उदासीनता क्यों

इन सबमें अध्यात्मवाद सबसे अहम कड़ी है जहां एक ओर यह समाज में धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा देता है, वहीं यह धार्मिक कट्टरपंथता का समूल नाश कर आध्यात्मिक उत्थान करता है और यही आध्यात्मिक उत्थान किसी भी व्यक्ति के चहुंमुखी उत्थान का कारक है, फिर चाहे वह विज्ञान से जुड़ा हो या ह्युमैनिटी से जुड़ा। सत्य की हर परत अध्यात्मवाद की गोद में आकर ही खुलती है...

किसी भी राष्ट्र की शिक्षा का समाज के दिशा निर्धारण में अहम  योगदान होता है और स्कूल इसकी प्रथम इकाई है। स्कूल वह समय है विद्यार्थी के लिए, जब वह विभिन्न विषयों के अध्ययन द्वारा सिर्फ कक्षा पास करने व अच्छे नंबरों का निर्धारण ही नहीं करता है, बल्कि अपने परिवेश व विभिन्न विषयों के प्रति एक स्वतंत्र सोच भी बनाता है, जिसका वह अपने आसपास की चीज़ों के साथ सामंजस्य बैठाने की कोशिश करता है। स्कूल का वह समय है जब विद्यार्थी   पियर ग्रुप से जुड़ता है। सकारात्मक सहयोग, मेहनतकश, परिश्रम, तर्कसंगत सोच व एकाग्रता, बुद्धि कौशल का विकास हर विषय को पढ़ते हुए विद्यार्थी सीखता है। जैसे मान लो कोई गणित पढ़ रहा है तो वह उसे अपने आसपास की चीजों को जोड़ता है। जब वह दूसरे बच्चे की मदद करता है तो वह सहयोग की भावना से जुड़ता है।

जब गणित की समस्याओं से वह जूझता है तो उसमें धैर्य व एकाग्रता जैसे गुणों का विकास होता है व जि़ंदगी में आने वाली समस्याओं से निपटने के लिए वह तैयार हो रहा होता है। उसे  मेहनत का मर्म समझ आने लगता है और वह अपने आपको समाज से जोड़ने का प्रयास करता है। विज्ञान के विषय जहां तर्क की कसौटी पर खरे उतरते हैं व तथ्य आधारित अपना परिचय देते हैं, वहीं समाज की एक धारणा जो इन्हें जीविका प्रधान व बुद्धिमानी के पैमाने से आंकती  है। तर्कशीलता व बुद्धि कौशल समाज में सहयोग अवधारणा के लिए जहां परिपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन समाज की समझ के बिना व्यक्ति कई बार स्व केन्द्रित होकर सिर्फ स्वयं के निर्माण को ही जीवन के मूल में देखता है और जीवन सौंदर्य को देय की जगह लेय में अधिक आत्मानुभूति पाता है। सभ्यता के मोड़ पर सुख के अंधेरों में, प्रकाश की रोशनी जो परसुख में है, से जीवन पर्यन्त विमुख रहता है। जो उसे किसी महापुरुष की जीवनी से अवश्य प्राप्त हो जाती है या समाज में घटित घटनाएं उसे अपनी समाज के प्रति धारणा के साथ-साथ सहानुभूति पूर्ण रवैये को समझ से मिलाने का कार्य करती है। कवियों की कल्पना जीवन दर्शन को प्रकट ही नहीं करती, अपितु संवेदनशीलता के बीज विद्यार्थी के जीवन में अंकित करती है। भूगोल को पढ़ते-पढ़ते विद्यार्थी स्वयं को धरा के सौंदर्य से जोड़कर संगीतमय हो तो विडम्बना कैसी? ऐसे ही ह्युमैनिटी के हर विषय में समझ विकसित करने का शानदार समावेश है, जीवन सौंदर्य व संस्कृति से जुड़ी गहन भावना विद्यमान है। जीवन परिचय देने वाले अटल सत्य से जुड़े हैं यह ह्युमैनिटी के विषय।

 यह विषय समाज को एक-दूसरे से जोड़ते ही नहीं बल्कि परिपक्वता की ऐसी गहन समझ इसमें विद्यमान है जो सौंदर्य से फलीभूत, आत्म स्वाभिमान से परिपूर्ण, स्व उपकार संग परोपकार की भावना, आत्म संवेदनशीलता, मनोस्थिति पर अंकुश व समाज निर्माण की भावना को बलवती करती है। फिर ऐसी क्या वजह रही जो समाज ने आज भी विज्ञान के विषयों को ही बुद्धिमत्ता की कसौटी मान रखा है, जबकि बुद्धिमत्ता के पैमाने में सिर्फ विषय पारंगता नहीं आंकी जाती, बल्कि समाज को जोड़ते हुए जीवन मूल्यों का समावेश, जि़ंदगियों को जो जोड़े व भावनाओं को जो प्रबल मोड़ पर अंकुश लगाने का काम करे, बुद्धिमत्ता की कसौटी पर खरे उतरने के पैमाने हो सकते हैं। फिर ऐसे कौन से कारक हैं जो जि़ंदगी की सच्चाइयों को तोड़ मरोड़ कर, विषयवाद में उलझा कर रखा है। क्या इसके लिए हमारा समाज जि़म्मेदार है या अभिभावक या फिर स्कूल जहां समझ से समझ का मिलान करने में समझ को समय लग रहा है। क्या स्कूल ह्युमैनिटी के विषयों की समझ समाज में विकसित करने में असफल रहे हैं। प्रश्न तो यह भी है कि क्या अध्यापकों को समाज ही उसके योग्य सम्मान देने में असफल रहा है, क्योंकि विदेशों में नज़र दौड़ाई जाए तो वहां अध्यापकों को उच्च मानदेय के साथ सम्मान की श्रेणी में भी अव्वल माना जा रहा है। क्या हमारे देश में अध्यापकों के सम्मान में प्रश्नचिन्ह नजर आ रहा है, क्योंकि एक अध्यापक सोशल इंजीनियर भी है, जो सोसायटी का निर्माण करता है। क्योंकि वह बच्चों, अभिभावकों व स्कूल के बीच एक कड़ी के रूप में स्थानीय लोगों से जुड़ा होता है व समाज के निर्माण में अहम भूमिका निभाता है। तो क्या अध्यापक समाज की सोच को नहीं बदल पाया या स्वयं ही स्कूल ह्युमैनिटी के विषयों को हल्के में ले रहा है।

सरकारी नीतियां भी नंबर आधारित परीक्षा के अंतर्गत घूमती नज़र आती हैं। गणित व विज्ञान में नंबर नहीं ले पा रहे बच्चे या वैज्ञानिक दृष्टिकोण बच्चों में नहीं पनप रहा तो उससे संबंधित अध्यापकों की ट्रेनिंग जैसे कई तरह के प्रोग्राम स्कूलों में दृष्टिगोचर हैं। लेकिन ह्युमैनिटी के इन विषयों को रट्टेपन की कसौटी में अधूरा छोड़कर जो पग आगे बढ़ रहा है, वह पीछे धुंधली सी परछाई लिए कहीं कालिमा लपेटे अंधकार में लोटते हुए प्रकाश से महरूम तो नहीं हो रहा है। क्योंकि यह विषय सिर्फ विषय नहीं, बल्कि समझ को सत्य से जोड़ने की एक कड़ी है, जिससे एक भ्रष्टाचार विमुख, सत्य की कल्पना पर आधारित, धार्मिक सहिष्णुता लिए, सत्य का बोध कराते हुए, सबको जीने का अधिकार देने वाली सोच व संसारवाद के साथ-साथ अध्यात्मवाद का भी उदय समाहित है। तो फिर इन विषयों के प्रति उदासीनता समाज को क्या कभी सही दृष्टिकोण दे पाएगी? इन सबमें अध्यात्मवाद सबसे अहम कड़ी है जहां एक ओर यह समाज में धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा देता है, वहीं यह धार्मिक कट्टरपंथता का समूल नाश कर आध्यात्मिक उत्थान करता है और यही आध्यात्मिक उत्थान किसी भी व्यक्ति के चहुंमुखी उत्थान का कारक है, फिर चाहे वह विज्ञान से जुड़ा हो या ह्युमैनिटी से जुड़ा। सत्य की हर परत अध्यात्मवाद की गोद में आकर ही खुलती है। अतः ह्युमैनिटी से संबंधित बच्चों के सर्वांगीण विकास के प्रति भी हमारे समाज को सचेत होने की आवश्यकता है व इन विषयों पर भी ध्यान केंद्रित कर, सर्वांगीण विकास की अहम कड़ी, अध्यात्मवाद से शिक्षा को जोड़ना वक्त की मांग ही नहीं, उच्च प्राथमिकता भी होनी चाहिए।

रीना भारद्वाज

लेखिका रोहड़ू से हैं