Tuesday, December 07, 2021 06:03 AM

बांध विस्थापन का दर्द उपचुनाव में क्यों नहीं?

पौंग बांध विस्थापित ऐसे हालात में अपने आपको दशकों से ठगा महसूस कर रहे हैं। एक तो उपजाऊ भूमि गंवा चुके हैं, ऊपर से इसके बदले अभी तक कुछ हासिल नहीं कर पाए...

उपचुनाव फतेहपुर की वेला पर भी इस हल्के से हजारों पौंग बांध विस्थापितों का मुद्दा गायब है। नेतागण एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने तक सीमित हैं। जनता की समस्याओं से उनका कोई सरोकार नजर नहीं आता है। दशकों गुजर जाने के बावजूद बेघर हुए लोगों को न्याय पाने के लिए सडक़ों पर उतरना पड़े तो इससे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्था की त्रासदी और क्या हो सकती है। अफसोस इस बात का कि जमीन दी धानी, मगऱ बन न सके पौंग बांध विस्थापित अब तक भी राजस्थानी। केंद्र और हिमाचल प्रदेश में भाजपा सरकारें होने पर भी इन असहाय गरीब परिवारों के नाम पर सिर्फ राजनीति ही की जाती रही है। पीडि़त व्यक्ति को देरी से मिलने वाला न्याय, न्याय नहीं होता, जहां कई पीढिय़ों के लोग बेबसी की वजह से मर चुके हों। सरकारें और न्यायालय बेघर हुए लोगों को आज दिन तक न्याय नहीं दिला पाए हैं। अब पौंग बांध विस्थापितों को न्याय की आस तो बस सिर्फ सर्वोच्च न्यायालय से है। सात दशकों से विस्थापन का दंश झेल रहे पौंग बांध विस्थापितों को राजस्थान में मिलने वाले मुरब्बों की प्रक्रिया कब पूरी होगी, कोई नहीं जानता है।

हिमाचल प्रदेश की सरकारों ने राजस्थान सरकार से मिलकर कुछ पौंग बांध विस्थापितों को राजस्थान में मुरब्बे दिलाने की पहल की थी, मगऱ विस्थापितों ने राजस्थान सरकार के इस फैसले पर एतराज़ जताया कि जमीन एक जगह की बजाय टुकड़ों में उन्हें दी जाएगी। इसलिए ऐसी जगह पर न तो बिजली और न ही पानी और सडक़ नाम की सुविधा है। ऐसे मुरब्बे लेने का ही क्या औचित्य है जहां पर खेतीबाड़ी भी न की जा सके। पौंग बांध विस्थापितों ने इसके बाद बैठक करके अपने हकों के लिए लडऩे की आगामी रणनीति बनाई। पौंग बांध विस्थापित ऐसे हालात में अपने आपको दशकों से ठगा महसूस कर रहे हैं। एक तो उपजाऊ भूमि गंवा चुके हैं, ऊपर से इसके बदले अभी तक कुछ हासिल नहीं कर पाए। कभी कांगड़ा जिला की सबसे उपजाऊ हल्दून घाटी के लोग खेतीबाडी करके अपना जीवन यापन करते थे। सन् 1926 में पंजाब सरकार की ओर से पौंग बांध बनाने की प्रपोजल तैयार की गई। सन् 1955 में जिओलॉजिकल सर्वे विभाग ने पूरे एरिया का अध्ययन किया। सन् 1959 में पौंग बांध का डिजाइन बनाया गया और अंतिम रूप सन् 1961 को दिया गया। इस परियोजना के पावर स्टेशन सन् 1974 में बनकर पूरे हुए। पौंग बांध कार्य सन् 1978 में शुरू होकर 1983 में पूरा हुआ। परियोजना के लिए विस्थापित हुए लोगों का पुनर्वास आज दिन तक नहीं हो पाया है। इस घाटी के लोगों को राजस्थान में बसाने को लेकर एक योजना बनाई गई थी। हिमाचल और राजस्थान सरकारों ने समझौते करके निर्णय लिया था कि पौंग बांध विस्थापितों को राजस्थान में मुरब्बे दिए जाएंगे। कई दशकों के लंबे इंतजार के बाद मुरब्बे आबंटन की प्रक्रिया शुरू हो पाई।

राजस्थान सरकार गंगानगर की बजाय पौंग बांध विस्थापितों को जैसलमेर में बसाना चाहती थी। शुरुआती दौर में ही राजस्थान सरकार की नीयत में खोट साफ देखी जा सकती थी। इसलिए ही विस्थापित अभी तक मुरब्बों पर सही ढंग से काबिज नहीं हो पा रहे हैं। पौंग बांध विस्थापितों को जैसलमेर के दूरदराज इलाकों रामगढ़ और मोहनगढ़ में मुरब्बे दिए गए। इन अति पिछड़े इलाकों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। वहां बेघर हुए हिमाचली लोगों को बसाया गया। इस बीच विस्थापितों की स्थायी समिति ने पुनर्वास का स्थान बढ़ाने की पुरजोर मांग की, मगऱ भूमि चयन का अधिकार केवल मात्र भारत सरकार और दोनों राज्यों की सरकारों का था। इसलिए यह प्रक्रिया सिरे न चढ़ सकी। उस समय राजस्थान में गंगानगर जिले में 2,20 लाख एकड़ भूमि पुनर्वास के लिए अधिसूचित हुई। हालांकि दोनों राज्यों की सरकारों के समझौते के अनुसार जिन पौंग बांध विस्थापितों को राजस्थान में मुरब्बा नहीं मिलेगा, उन्हें हिमाचल प्रदेश में ही बसाया जाएगा। पौंग बांध निर्माण में उजड़े परिवारों में से प्रदेश सरकारें 16,342 परिवारों को ही राजस्थान में भूमि आबंटन के लिए योग्य करार दिया गया था। अभी तक प्रदेश सरकार 105824 को राजस्थान में भूमि आबंटन करवाने में सफल हो पाई है। 143 लाख एकड़ जमीन का आबंटन होना अभी बाकी है। पौंग बांध विस्थापित जो वहां पर खुद खेतीबाड़ी कर रहे हैं, वही अपनी जमीनों पर काबिज हैं। कुछेक पौंग बांध विस्थापितों ने अपने मुरब्बे राजस्थान के लोगों को खेतीबाड़ी करने के लिए सौंप रखे थे। नतीजतन ऐसे लोगों के साथ जालसाजी की गई है। गंगानगर में हिमाचली लोगों की अधिकतर जमीनें राजस्थान के प्रभावशाली लोगों ने उन पर जबरदस्ती कब्जा करके रखा है। ऐसे हालात में राजस्थान सरकार अवैध कब्जाधारियों पर कोई कड़ी कार्रवाई नहीं कर पा रही है। यही नहीं पौंग बांध विस्थापितों के कुछ मुरब्बों का अवैध कब्जाधारियों ने जाली दस्तावेज तैयार करके आगे उन्हें किसी दूसरे व्यक्ति के पास बेच दिया है। ऐसे हालात में कब्जा दोबारा से ले पाना विस्थापितों के लिए मुसीबत बना हुआ है।

पुनर्वास के चक्कर में कई लोगों पर आत्मघाती हमले करके उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया है। प्रदेश सरकार भी ऐसे अवैध कब्जाधारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई न करके पुन: विस्थापितों के कब्जे दिलाने में कोई पहल नहीं दिखा रही है। राजा का तालाब स्थित भू-अर्जुन अधिकारी कार्यालय के सहयोग से नजायज कब्जे हटाकर पुन: पौंग बांध विस्थापितों को बसाने की कोशिशें जारी हैं। चुनाव नजदीक आते देखकर हर बार सरकारें पौंग बांध विस्थापितों के जख्मों पर मरहम लगाने की कोशिश करती हैं, मगऱ अभी तक सफल नहीं हो पाई हैं। पौंग बांध विस्थापित जिन्होंने अपनी उपजाऊ भूमि खोई, उन्हें ऐसी जगह भूमि आबंटित की जाती रही, जहां सुविधाओं की कमी होती है। ओबीसी के नेता आपस में वर्चस्व की लड़ाई लडऩे में मशगूल रहते हैं, मगऱ कोई भी नेता खुलकर पौंग बांध विस्थापितों की लड़ाई लडऩे को तैयार नहीं है। पौंग बांध के निर्माण में सबसे ज्यादा जमीन इसी समुदाय को आबंटित हुई है। ओबीसी की आबादी लाखों में होने के बावजूद यह लोग आज दिन तक अपने हक सरकारों से लेने में कामयाब नहीं हो पाए हैं। पूर्व राजस्व मंत्री राजन सुशांत ने पौंग बांध विस्थापितों को उनके हक मिल सकें, इसलिए काफी संघर्ष किया। राजा का तालाब में भू-अर्जुन अधिकारी कार्यालय खुलना और पौंग बांध विस्थापितों के लिए सराय का निर्माण होना भी उन्हीं की देन है। सराय का रखरखाव सही न होने की वजह से वह खंडहर बन गई है।

सुखदेव सिंह

लेखक नूरपुर से हैं