Tuesday, December 07, 2021 05:56 AM

क्यों बंद हुआ स्पोर्ट्स सेंटर

खेल नीति के इंतजार में हिमाचल में खेलो इंडिया खेलो के संकल्प ही धराशायी हो जाएं, तो इस मुकाम पर हासिल क्या होगा। धर्मशाला में भारतीय खेल प्राधिकरण द्वारा तीन दशक से भी पहले से चल रहा खेलों के विकास का रथ आज धंसता हुआ नजर आ रहा है। वर्ष 1992 में आई खेल विकास परियोजना, जो बाद खेल प्राधिकरण के छात्रावास की 1998 से रखवाली कर रही है, अचानक क्यों हार गई। जिस साई गल्र्स स्पोट्र्स सेंटर से निकली छात्राओं की बदौलत हिमाचल की लड़कियों ने भारतीय महिला कबड्डी को पदक तक पहुंचाया। जिसके प्रशिक्षण ने दर्जनों उडऩ परियां तैयार की हों और जहां एक साथ पांच खेलों के प्रशिक्षण में हिमाचल की बेटियां निरंतर तमगे पहन रही हों, वहां से ऐसे महत्त्वपूर्ण छात्रावास का सिमट जाना प्रदेश की प्रतिभा को अपमानित करने जैसा है। एक ही गले में दो तरह के मोतियों की माला पहनने से न गला बचेगा और न ही शान। यही धर्मशाला के खेल परिसर से हुई छेड़छाड़ का प्रतिफल होगा। वर्षों से मंजूर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस तथा इससे संबंधित छात्रावास व अन्य सुविधाओं के लिए करीब 26 करोड़ रुपए का सदुपयोग न करने के बजाय अगर इसके लिए पूर्व से स्थापित महिला छात्रावास की संभावना को ही खुर्द-बुर्द होना पड़े, तो यह खेल भावना नहीं, बल्कि खेलों के क्षेत्र में राजनीति का दुष्परिणाम ही माना जाएगा।

हैरानी यह कि वर्तमान सरकार अतिरिक्त भूमि जुटाकर उस बजट का इस्तेमाल नहीं करवा पाई जिसके तहत उत्कृष्ट खेल प्रशिक्षण का परिसर विकसित होना था, लेकिन इसके एवज में हिमाचली बच्चियों से उनका खेल भविष्य ही छीन लिया। हैरानी यह भी कि पूर्व सरकार ने धर्र्मशाला में ही जो अतिरिक्त भूमि उत्कृष्ट खेल प्रशिक्षण के लिए दी थी, उसे भी नाकारा साबित होना पड़ा। ऐसे में खेलों के प्रति नकारात्मक प्रवृत्तियों से उत्पन्न हुई राजनीति अब हिमाचल की प्रतिभाओं से भी अन्यायपूर्ण व्यवहार करने से गुरेज नहीं कर रही। सवाल यह भी है कि इस बहाने कांगड़ा से एक खेल संस्थान छीना जा रहा है। अगर ऐसा है तो कांगड़ा से ही खेल मंत्री राकेश पठानिया भी इसके लिए जवाबदेह हैं। दूसरी ओर केंद्र में खेल मंत्री अनुराग ठाकुर के मंत्रालय का प्रदर्शन अगर तीन दशक पुराने हो चुके खेल केंद्र के अस्तित्व को समाप्त कर रहा है, तो यह मसला अति गंभीर है। वे तमाम खेलों संबंधी घोषणाएं जो अनुराग ठाकुर या राकेश पठानिया ने की हैं, उनकी कलई इस हकीकत में खुल जाती है कि वर्षांे से चल रहे खेल प्रशिक्षण केंद्र को बंद कर दिया जाता है और राज्य अपनी खुमारी में रहता है। खेल मंत्री साइना नेहवाल की बैडमिंटन अकादमी की बड़ी घोषणा करके धर्मशाला का मुकुट सजाते हैं, तो केंद्रीय खेल मंत्री हाई आल्टीच्यूट स्पोट्र्स प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करने का उद्घोष करते हैं, जो यथार्थ में सुरमा चुराने जैसा ही साबित हो रहा है।

कभी पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने धर्मशाला को खेल नगरी की उपमा में ढांचा उपलब्ध कराया था या अपने जुनून को जमीन पर उकेरते हुए अनुराग ठाकुर ने यहीं पर विश्व का सबसे सुंदर क्रिकेट स्टेडियम स्थापित किया था, लेकिन अब यहां परियोजनाएं क्यों रूठ कर बाहर निकल रही हैं। क्या यह खेलों के साथ कोई घिनौना खेल है या वास्तव में हिमाचल की लड़कियां इतनी प्रशिक्षित हो गईं कि उन्हें तीस साल पुराने खेल संस्थान की जरूरत ही नहीं रही। कहां तो हिमाचल के हर जिला में अलग-अलग खेलों की प्रशिक्षण अकादमियां खोलने की बात हो रही है और कहां खेल नीति के प्रकट होने की आशंका दिखाई देने लगी है। हिमाचल में खेल स्कूल, स्पोट्र्स कालेज और खेल विश्वविद्यालय तक खोलने की घोषणाएं होती रही हैं, लेकिन इस दिशा में आरंभिक प्रयास ही दिखाई नहीं दे रहे। ऊना, बिलासपुर, हमीरपुर, धर्मशाला, मंडी व सुंदरनगर जैसे शहरों में खेल ढांचा दिखाई देने लगा है और अगर इसे संस्थागत स्वरूप दिया जाए, तो बच्चे खेलों के माध्यम से करियर ढूंढ पाएंगे। जाहिर तौर पर धर्मशाला के साई गल्र्स स्पोट्र्स सेंटर निकलीं हिमाचली बेटियों ने न केवल खेलों में शोहरत हासिल की, बल्कि खेलों को करियर में उज्ज्वल मुकाम दिखाया है। ऐसे में धर्मशाला से गायब हुए खेल केंद्र को नहीं बचाया गया, तो इससे एक मुहिम व हजारों सपनों की हत्या भी होगी।