Sunday, March 07, 2021 11:50 PM

क्या प्रदेश का भी होगा अपना क्रीड़ा संस्थान

यह उस देश के लिए लज्जाजनक है जिसका प्रधानमंत्री काफी लोकप्रिय है तथा जिनका सम्मान दुनियाभर में भी किया जाता है। मेरे विचार में अब विकल्प यही है कि संविधान के मुताबिक कार्रवाई की जाए। संविधान के अनुसार कानून-व्यवस्था तथा कृषि जैसे विषय विभिन्न सरकारों के अधीन आते हैं। अगर केंद्र सरकार ने समवर्ती सूची में विषय होने के कारण अपने अधीन आते इस मामले में कानून बनाया है, तो इसे लागू करने का दायित्व राज्यों पर है। जो राज्य इसे लागू करना चाहें, वे कर सकते हैं तथा जो राज्य लागू न करना चाहें, वे इसे लागू न करें। वैसे अधिकतर राज्य इन कानूनों के पक्ष में हैं। इस तरह किसान वही लागू करें जो उन्हें पसंद है तथा जो राज्य इसके पक्ष में नहीं हैं, वे इन्हें लागू न करें। यदि किसान और सरकारें इससे सहमत न हों, तो विकल्प यही है कि कानून-व्यवस्था को लागू किया जाए। भारत में आजकल लोकतंत्र कठिन चरण से गुजर रहा है...

लोकतंत्र के बारे में प्रसिद्ध राजनीतिक विज्ञानी हारोल्ड लास्की ने एक बार कहा था कि यह एक ऐसा हैट है जो कि अपना स्वरूप खो चुका है, क्योंकि इसे असंख्य लोगों द्वारा पहना जाता है। अमरीका के कैपिटल हिल में जो कुछ घटित हुआ तथा अब दिल्ली में किसानों की राजनीति में जो कुछ हो रहा है, ये दोनों लोकतंत्र के विलक्षण उदाहरण हैं। अमरीका के मामले में एक वैधानिक चुनाव तथा जो बाइडेन की जीत के खिलाफ यह एक हिंसक प्रदर्शन था। जो बाइडेन अमरीका के नए राष्ट्रपति के रूप में शपथ ले चुके हैं। इधर भारत में वैधानिक रूप से चुनी गई सरकार के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं। भारत में किसानों का प्रदर्शन ज्यादा विचित्र है। किसानों के प्रदर्शन में अब तक कोई हिंसा नहीं हुई है, किंतु यह उद्दंड प्रकार का है तथा यह बिना किसी प्रत्यक्ष न्यायिक कारण के ही है। इस आंदोलन के कारण क्या हैं? किसानों की मांग है कि उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जाए। सरकार का इस पर कहना है कि यह पहले से दिया जा रहा है तथा आगे भी जारी रहेगा, किंतु किसानों को ज्यादा कीमत दिलाने के लिए वे अपनी फसल को खुले बाजार में बेचने के लिए स्वतंत्र होने चाहिएं। किसान चाहते हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाया जाए। सरकार इसके विषय में लिखित आश्वासन देने को राजी है, किंतु किसान इस पर सहमत नहीं हैं। वे चाहते हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी रूप दिया जाए। अगर किसान विवाद को चार प्वाइंट तक घटाते हैं और समझौते के लिए आगे बढ़ने के लिए दो प्वाइंट पर सहमत होते हैं तो वे फिर पीछे हट जाते हैं और कहते हैं कि वे प्वाइंट वाइज चर्चा नहीं चाहते हैं। अब तक सरकार और किसानों में नौ वार्ताएं हो चुकी हैं, फिर भी कोई समाधान नहीं निकला और न ही भविष्य में कोई समाधान निकलता दिखाई दे रहा है।

किसान पिछले 90 दिनों से दिल्ली जाने वाले मार्गों को रोके हुए हैं। इससे सामान्य आवाजाही बाधित हुई है तथा इन मार्गों से रोज गुजरने वाले लोगों के सामने नई समस्या खड़ी हो गई है। किसान सुप्रीम कोर्ट भी जाते हैं, लेकिन वे कोर्ट के फैसले से भी सहमत नहीं हैं। वे न तो सरकार की बात सुनने के लिए तैयार हैं, न ही कोर्ट की बात मानने को तैयार हैं। अब सरकार के पास भी कोई विकल्प नहीं बचा है। किसान तीनों कृषि कानूनों को रद करने की मांग पर अड़े हैं। सरकार कहती है कि ये कानून किसान हित में ही बनाए गए हैं, इसलिए वह इन्हें रद नहीं करेगी। सरकार ने किसानों को अन्य विकल्प देने के लिए कहा, किंतु किसान कोई अन्य विकल्प देने के लिए तैयार नहीं हैं। यह भी एक तथ्य है कि कोर्ट का काम कानून बनाना नहीं होता, बल्कि वह संविधान की व्याख्या करती है तथा कानून का औचित्य जांच सकती है। अब अगर कोर्ट कुछ हद तक आगे जाती है, तो सरकार को लगेगा कि न्यायपालिका प्रशासन में दखल देने लगी है, जो कि उसका काम नहीं है, बल्कि यह काम सरकार का है। ऐसी स्थिति के कारण ही कोर्ट ने मामले को अपने हाथ में लेने से उसे रोक दिया है। सरकार पर दबाव बनाने के लिए किसान अब दिल्ली में हजारों ट्रैक्टर लेकर आना चाहते हैं। उन्हें यह कार्य करने में कोई संकोच नहीं है, जबकि 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रीय समारोह होने जा रहा है। इससे आम नागरिकों के सामान्य जनजीवन में भी बाधा पहुंचेगी। किसान प्रदर्शन के लिए अपने साथ महिलाएं और बच्चे भी ले आए हैं। प्रदर्शन में शामिल कई किसानों की ठंड के कारण मौत भी हो चुकी है। प्रदर्शन में सबसे लज्जाजनक यह है कि किसानों के साथ आई महिलाएं वह कर रही हैं, जिसे पंजाब में ‘स्यापा’ कहा जाता है। यह प्रथा किसी व्यक्ति की मौत पर निभाई जाती है। प्रदर्शनकारी देश के प्रधानमंत्री को भी आपत्तिजनक शब्दों में गालियां दे रहे हैं।

यह उस देश के लिए लज्जाजनक है जिसका प्रधानमंत्री काफी लोकप्रिय है तथा जिनका सम्मान दुनियाभर में भी किया जाता है। मेरे विचार में अब विकल्प यही है कि संविधान के मुताबिक कार्रवाई की जाए। संविधान के अनुसार कानून-व्यवस्था तथा कृषि जैसे विषय विभिन्न सरकारों के अधीन आते हैं। अगर केंद्र सरकार ने समवर्ती सूची में विषय होने के कारण अपने अधीन आते इस मामले में कानून बनाया है, तो इसे लागू करने का दायित्व राज्यों पर है। जो राज्य इसे लागू करना चाहें, वे कर सकते हैं तथा जो राज्य लागू न करना चाहें, वे इसे लागू न करें। वैसे अधिकतर राज्य इन कानूनों के पक्ष में हैं। इस तरह किसान वही लागू करें जो उन्हें पसंद है तथा जो राज्य इसके पक्ष में नहीं हैं, वे इन्हें लागू न करें। यदि किसान और सरकारें इससे सहमत न हों, तो विकल्प यही है कि कानून-व्यवस्था को लागू किया जाए। भारत में आजकल लोकतंत्र कठिन चरण से गुजर रहा है। सरकार कृषि सुधारों पर आगे बढ़ता चाहती है, जो आज की निहायत जरूरत भी है। इसके बावजूद वह आगे नहीं बढ़ पा रही है। उसके कदम रोके जा रहे हैं। इस तरह तो किसी भी सरकार के लिए काम करना मुश्किल हो जाएगा। यह स्थिति सरकार और लोगों को यह सोचने पर विवश कर रही है कि देश में किस प्रकार की सरकार होनी चाहिए। यह एलेक्जेंडर पोए थे जिन्होंने लिखा ः ‘सरकार के प्रकार के लिए मूर्खों को लड़ने दें, जो सबसे बढि़या है, शासित ही सबसे बढि़या है।’

मेरे विचार में सरकार को अब यह करना चाहिए कि इन कानूनों को लागू करने के लिए राज्य सरकारों पर छोड़ देना चाहिए। जो राज्य सहमत हों, वे इन्हें लागू करेंगे और जो सहमत न हों, वे इन्हें लागू न करें तथा अपनी पसंद के अनुसार कोई नया कानून बना लें। कोई राज्य अगर न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी रूप देना चाहे तो वह इसके लिए स्वतंत्र है। इस तरह अपनी-अपनी इच्छानुसार काम करने की स्वतंत्रता सभी राज्यों को मिल जाएगी। इससे राज्य का शासनतंत्र भी चलता रहेगा तथा किसान भी अपनी पसंद के अनुसार कानून बनवा सकेंगे।

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केंद्र व केरल सरकार की तर्ज पर प्रशिक्षकों को भी खिलाड़ी की तरह नगद ईनामी राशि व अवार्ड मिलना चाहिए। आप हर विद्यार्थी को फिटनेस के लिए खेल मैदान में ले जाएंगे, उनमें से जरूर कुछ अच्छे खिलाड़ी भी मिलेंगे। प्रतिभा खोज के बाद पढ़ाई के साथ-साथ प्रशिक्षण के लिए अच्छी खेल सुविधाएं मुहैया कराई जानी चाहिएं। इसके लिए राष्ट्रीय क्रीड़ा संस्थान की तर्ज़ पर अपना राज्य क्रीड़ा संस्थान हो। वहां पर हिमाचल प्रदेश के खिलाडि़यों को वैज्ञानिक आधार पर लंबी अवधि के प्रशिक्षण शिविर लगें तथा प्रदेश के शारीरिक शिक्षकों व पूर्व राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय खिलाडि़यों के लिए सेमिनार व कम अवधि के प्रशिक्षक बनने के कोर्सेज हों...

पिछले तीन सालों से हिमाचल प्रदेश में खेल नीति को नया स्वरूप देने की बात चल रही है, मगर अभी तक भी पूरा मसौदा तैयार नहीं हो पाया है। बात चाहे खेल ढांचे की हो या प्रशिक्षण कार्यक्रम की, यह सब खिलाड़ी के अनुरूप हो जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ी प्रतिस्पर्धा देकर खिलाड़ी प्रदेश व देश को पदक जीतकर तिरंगे को सबसे ऊपर उठा कर जन गन मन की धुन पूरे विश्व को सुना सकें। हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन हुकमरानों ने खेल विभाग को कभी खेल प्राधिकरण तो कभी खेल संस्थान बनाने की वकालत की है, मगर हिमाचल प्रदेश में खेलों की हकीकत सबके सामने है। हिमाचल प्रदेश में कई खेलों के लिए विश्व स्तरीय खेल ढांचा तो बन कर तैयार हो चुका है, मगर प्रशिक्षकों व अन्य सुविधाओं के अभाव में वहां पर उस तरह का प्रशिक्षण कार्यक्रम आरंभ नहीं हो पाया है। हिमाचल प्रदेश में अभी तक भी खेल संस्कृति का अभाव साफ  देखा जा सकता है। धूमल सरकार में बनी खेल नीति में हिमाचल के खिलाडि़यों को सरकारी नौकरी में तीन प्रतिशत आरक्षण बहुत बड़ी सौगात है। अब दो दशक बाद विभिन्न पहलुओं के ऊपर नई खेल नीति में सुधार किया जा रहा है। बीते साल खेल मंत्री की धर्मशाला के मिनी सचिवालय में नई खेल नीति के लिए राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन कर चुके खिलाडियों, प्रशिक्षकों व खेल संघों के पदाधिकारियों के साथ एक मैराथन बैठक हुई। इस बैठक में खेल के उत्थान से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हुई। इसके बाद भी खेल मंत्री ने व्यक्तिगत तौर पर विभिन्न खेल संघों से मिल कर लंबी चर्चा कर नई खेल नीति के लिए व्यावहारिक पहलुओं तक जाने की सोची थी, मगर कोरोना के दोबारा कहर से वह सब नहीं हो पाया है। इसके बाद अब खेल विभाग के अधिकारी व खेल के जानकार अपनी खेल नीति को नए स्वरूप तक ले जाने के लिए संघर्षशील हो गए हैं।

खेलों में अधिक से अधिक लोगों की भागीदारी सुनिश्चित हो, इससे जब हजारों विद्यार्थी फिटनेस कार्यक्रम से गुजरेंगे तो उनमें कुछ अच्छे खिलाड़ी भी मिलेंगे। खेल मंत्री हिमाचली खिलाडि़यों से राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक विजेता प्रदर्शन के लिए राज्य में अधिक से अधिक खेल अकादमियां व शिक्षा संस्थानों में खेल विंग, स्थान की सुविधा व प्रतिभा को देखते हुए सरकारी व खेल संघों के माध्यम से खोलने को कह रहे हैं तथा भविष्य में विभिन्न बड़ी कंपनियों से सीआरएस के माध्यम से राज्य में खेल ढांचे को सुदृढ़ करने की मंशा भी मंत्री ने जताई है। मनरेगा से भी ग्रामीण क्षेत्रों में प्ले फील्ड की सुविधा जुटाने की बात कही जा रही है। हिमाचल प्रदेश में विभिन्न खेलों का स्तर राज्य में खेल छात्रावासों के खुलने के बाद भी अभी तक सुधरा नहीं है। यह अलग बात है कि कुछ जुनूनी प्रशिक्षकों के बल पर कभी-कभी अच्छे परिणाम दे पाया है। हिमाचल प्रदेश राष्ट्रीय स्तर पर कुछ एक खेलों को छोड़ कर अधिकांश बार पिछड़ा ही रहा है। हिमाचल हो या देश का कोई अन्य राज्य, उत्कृष्ट प्रदर्शन करवाने के लिए केवल प्रशिक्षक ही मुख्य किरदार दिखाई देता है। यही कारण है कि भारत का खेल मंत्रालय व कई राज्य भी अपने यहां हाई परफॉर्मेंस प्रशिक्षण केंद्र खोलने पर जोर दे रहे हैं तथा वहां पर उत्कृष्ट प्रदर्शन करवाने वाले प्रशिक्षकों को अनुबंधित कर रहे हैं।  खेलो इंडिया, गुजरात व पंजाब के उच्च खेल परिणाम दिलाने वाले प्रशिक्षण केंद्रों की तरह ही हिमाचल प्रदेश में भी अधिक से अधिक इस तरह के हाई परफॉर्मेंस केंद्र व अकादमी खोलनी होगी। इन प्रशिक्षण केंद्रों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक विजेता प्रदर्शन करवाने वाले अनुभवी प्रशिक्षकों को उत्कृष्ट प्रदर्शन करवाने की शर्तों पर पांच वर्षों के लिए अनुबंधित करना चाहिए ताकि हिमाचल प्रदेश की संतानों को भी हिमाचल प्रदेश में रह कर ही वह प्रशिक्षण सुविधा मिल सके।

केंद्र व केरल सरकार की तर्ज पर प्रशिक्षकों को भी खिलाड़ी की तरह नगद ईनामी राशि व अवार्ड मिलना चाहिए। आप हर विद्यार्थी को फिटनेस के लिए खेल मैदान में ले जाएंगे, उनमें से जरूर कुछ अच्छे खिलाड़ी भी मिलेंगे। प्रतिभा खोज के बाद पढ़ाई के साथ-साथ प्रशिक्षण के लिए अच्छी खेल सुविधाएं मुहैया कराई जानी चाहिएं। इसके लिए राष्ट्रीय क्रीड़ा संस्थान की तर्ज़ पर अपना राज्य क्रीड़ा संस्थान हो। वहां पर हिमाचल प्रदेश के खिलाडि़यों को वैज्ञानिक आधार पर लंबी अवधि के प्रशिक्षण शिविर लगें तथा प्रदेश के शारीरिक शिक्षकों व पूर्व राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय खिलाडि़यों के लिए सेमिनार व कम अवधि के प्रशिक्षक बनने के कोर्सेज हों। साथ ही साथ यहां पर राष्ट्रीय प्रतियोगिता के पूर्व लगने वाले कोंचिग कैम्प भी अनिवार्य रूप से लगाए जाएं ताकि पहाड़ के लोगों को भी वही सुविधा उपलब्ध जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर के उत्कृष्ट प्रदर्शन किए जा सकें। खेल नीति में उन राष्ट्रीय पदक विजेताओं के लिए वजीफे की बात हो जो खेल छात्रावास के बाहर हों। उन्हें भी खेल छात्रावास के अंतर्गत दैनिक खुराक भत्ता व अन्य सुविधाओं के ऊपर खर्च होने वाली राशि के बराबर वजीफा देने की वकालत हो। जिन अवार्डी खिलाडि़यों व प्रशिक्षकों  के पास कोई नौकरी नहीं है, उन्हें साठ साल आयु के बाद पेंशन का प्रावधान हो। जब खेल नीति खिलाड़ी व प्रशिक्षक के इर्द-गिर्द होगी तो विश्व स्तर के परिणाम जरूर आएंगे।

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