Tuesday, December 07, 2021 06:10 AM

क्या धनिया फ्री मिलेगा

धनिया पत्ती जैसा शालीन उत्पादन शायद ही धरती पर कोई और होता होगा, बल्कि सब्जियों की बिक्री के साथ यह वर्षों से मुफ्त बंटकर भी शान से अकड़ा रहता है। मुफ्त की एंेठ कोई धनिए की पत्तियों से सीखे। किसी ने पूछा, ‘धनिया पेट्रोल की तरह क्यों नहीं बन जाता।’ बेचारे रामू काका को भी यह सौदा नहीं भाता कि सब्जी-तरकारी बेचने की रिश्वत में धनिए की पत्तियां मुफ्त में बांटता फिरे। एक दिन गुस्से में अपनी रेहड़ी ठीक पेट्रोल पंप के सामने लगा दी, लेकिन ताज्जुब यह कि वहां भी सौ रुपए से ऊपर प्रति लीटर दाम चुकाने वाले सब्जी के दाम में फ्री का धनिया मांगते रहे। धनिया पत्ती मांगने की मांग पता नहीं कैसे ईजाद हुई। वैसे मांगने की मांग ऐतिहासिक व राजनीतिक रही है। मांगने वाला हमेशा लोकतांत्रिक मांग पैदा करता है। पेट्रोल इसलिए लोकतांत्रिक नहीं है, क्योंकि इसे मांगना नहीं पड़ता। दुनिया में हर वस्तु की आपूर्ति में मांगने वालों की कमी नहीं, लेकिन किसी ने आज तक पेट्रोल मुफ्त में नहीं मांगा।

 इन्हीं नवरात्र में मुफ्त के लंगर या इससे पूर्व श्राद्धों में बेशकीमती व्यंजनों की कीमत सिर्फ किसी को मुफ्त में पेश करना ही तो रही। अब तो हमारे पड़ोसी नब्बे वर्षीय रोते राम ने बेटों के आगे शर्त रख दी है कि वे उसके मरने पर श्राद्ध के पकवान नहीं बांटेंगे, बल्कि उस दिन श्राद्ध का पेट्रोल बांटेंगे। बच्चे समझा रहे हैं कि वह पेट्रोल को पितृपक्ष से न जोड़ें, मगर बाप का मानना है कि आधुनिक युग में श्रद्धा का सबसे पावन उपभोग पेट्रोल पंप ही तो सिखा रहा है। हिंदोस्तान में लोगों ने मंदिरों का चढ़ावा घटा दिया, बढ़ती निजी स्कूलों की फीस से तंग होकर अभिभावकों ने बच्चे सरकारी स्कूलों में डाल दिए, लेकिन पेट्रोल के बढ़ते दामों पर उफ तक नहीं की। कारण यही कि हम सभी अपने श्राद्ध का पिंड छुड़वाते हुए पेट्रोल डलवा लेते हैं। पेट्रोल देश की क्षमता, राष्ट्र की भक्ति और केंद्र सरकार की कसौटी है।

 इतना महंगा पेट्रोल खरीदते हुए भी पंप की दिवार पर मुस्कुराते हुए प्रधानमंत्री के चित्र को देखकर क्या हम रो सकते हैं, कदापि नहीं। अगर आप नहीं माने या आपको शक है कि देश में भ्रष्टाचार, लूट या मिलावट हो रही है, तो देशभक्त पेट्रोल उछलता रहेगा। पेट्रोल ही देश की शुद्ध व अमूल्य वस्तु है, बल्कि पेट्रोल के सामने न कोई पक्ष है और न ही विपक्ष। मोदी जी की गाड़ी में अगर एक सौ दस रुपए प्रति लीटर के हिसाब से भरता है, तो मेरे बीस साल पुराने स्कूटर में भी इसी दाम से आता है। इस तरह एक पेट्रोल है जो हर नागरिक का रिश्ता सीधे प्रधानमंत्री से जोड़ता है। यह दम धनिए की पत्ती में नहीं कि किसी नागरिक को प्रधानमंत्री से जोड़ दे। देश की तरक्की के लिए धनिए की पत्ती तक का मोल होना चाहिए, मगर हमने उसे यह इज्जत नहीं बख्शी। सबसे ज्यादा इज्जत पेट्रोल व रसोई गैस को मिलेगी। बेचारा पेट्रोल अगर दस-बीस पैसे भी महंगा हो तो सारे देश को पता चल जाता है, वरना वर्षों से किसान ने किया क्या। अपनी उपज की कीमत को राष्ट्रीयता बताई होती, तो आम जनता भी महसूस करती कि रसोई की इज्जत रसोई गैस की कीमत से नहीं, बल्कि आलू-प्याज की कीमत से है। भारत का किसान फिजूल में आंदोलनरत है। उसे खुद को पेट्रोल मानकर बाजार में बैठना होगा ताकि दस-बीस पैसे बढ़ाते-बढ़ाते कीमत सैकड़ों रुपए तक पहुंच जाए। किसान को सबसे पहले धनिया पत्ती की इज्जत बचानी होगी, ताकि सरेआम सब्जी खरीददार मुफ्त में इसकी मांग न कर सके।

निर्मल असो

स्वतंत्र लेखक