Sunday, July 25, 2021 08:22 AM

महामारियों की तुलना गलत

सियासी सफर के मुकाम पर केंद्र से रिश्तों की बिसात और हकीकत के अर्थ में खोजा-पाया के हालात में मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के कार्यकाल का हिसाब, अब राजनीति का ऐसा गणित है जिससे प्रदेश की नागरिक जागरूकता अलंकृत होगी। केंद्र सरकार का हर फैसला जयराम ठाकुर को छांव देता रहा है और इसी तरह वैक्सीन की मांग अब उनके दायित्व को सरलता प्रदान करेगी। हमारा मानना है कि अगला चुनाव कोरोना काल के संबोधनों को याद करेगा और इन्हीं कदमों पर चलते हुए भाजपा की सत्ता को अपने प्रदर्शन की बेहतरी तराशनी होगी। ऐसे में दिल्ली दौरे की खनक में विकास के कंगूरे खड़े किए जा रहे हैं, तो केंद्रीय स्तर की मुलाकातें राजनीतिक छवि का परिमार्जन करते हुए मुख्यमंत्री के पक्ष में रेखांकन का नया दौर भी हो सकता है। विकास के घुटनों का दर्द हिमाचल महसूस करता रहा है, तो क्या चुनाव से ठीक पहले इनका आपरेशन हो रहा है, क्योंकि केंद्र के द्वार पर फिर से सड़क परियोजनाओं के मील पत्थर लग रहे हैं। यहां सवाल शिमला से नहीं कि दिल्ली कितनी दूर, बल्कि दिल्ली से है कि कभी नजदीक से भी पहाड़ सुहावने होंगे। जिस सुरंग पर मोदी राज का अलंकरण हुआ है, वह दरअसल अटल विहारी बाजपेयी के साथ प्रेम कुमार धूमल के रिश्तों का व्यावहारिक पक्ष भी तो है।

 जिस ऊना ट्रेन की पटरी पर आज कुछ पहिए घूमते हैं, उसको आगे बढ़ाने की फितरत क्यों दिखाई नहीं देती। क्यों हमीरपुर को जोड़ती रेलवे लाइन का राग ठंडा पड़ गया और बजट की आबरू में कांगड़ा एयरपोर्ट विस्तार की फाइल का हमेशा चीर हरण होता रहा। जयराम सरकार की आरंभिक फाइलों से कांगड़ा और हमीरपुर की बड़ी परियोजनाओं को खुर्दबुर्द करता एक मंत्री आज हिमाचली राजनीति के बड़े सपनों का सौदागर बनने की शक्तियां कैसे एकत्रित कर पाया। इस दौरान ढेर हुए कांगड़ा के नेता, उपेक्षित हुए मंत्री तथा सत्ता के लाभार्थी बने संघ परिवार के सदस्यों का असंतुलन क्या दुरुस्त हो पाएगा। वर्तमान हालात के सिर पर सींग बनकर उगे तीन उपचुनाव, भाजपा के करामाती होने के युद्ध में हैं तो घात-प्रतिघात कहीं पार्टी के भीतर, उल्टे बांस बरेली के न उगा दें। ये तीनों परीक्षाएं क्षेत्रीय संतुलन में इसलिए भी पढ़ी जाएंगी, क्योंकि कहीं कांगड़ा, कहीं मंडी, तो कहीं शिमला की पृष्ठभूमि में ये चुनावी बिसात बिछेगी। राजनीति के दत्तक पुत्र बनने की कई नई परंपराएं सत्ता से हासिल को बयां करती हैं। पिछली बार धर्मशाला और पच्छाद के उपचुनाव ने उम्मीदवारों के चयन से सफलता के प्रतिबिंब तक मुख्यमंत्री का साथ दिया था, तो इस बार कहीं तो सियासी तड़का बदलेगा। इस बार तीनों उपचुनावों में सत्ता की समीक्षा के साथ-साथ, भाजपा खुद को वंशवाद के नारों से कितना दूर रख पाती है, यह भी देखना होगा। यह इसलिए कि कोरोना काल में बंटती इम्युनिटी किटों पर भाजपा नेताआ की औलाद दिखाई दे रही है।

 इन किटों के सहारे कई चुनाव और चुनावी प्रक्रियाओं में उतरते नेताओं के उत्तराधिकारी देखे जा सकते हैं। इस काम में भाजपा ही नहीं, बल्कि कांग्रेसी तो अपनी परंपरा की सोहबत में प्रफुल्लित हैं। क्या भाजपा के कार्यकर्ता अब कांग्रेसी पायजामा पहनकर चलेंगे और प्रदेश में वंशवाद के नए पुरोधाओं को अगले चुनाव की वैतरणी पार कराएंगे या कहीं भीतर का गुस्सा पहाड़ी जटाओं की ऐंठ खोल देगा। बहरहाल मुख्यमंत्री को तीन दुर्गों पर पताका फहराने के लिए जनता का विश्वास, केंद्र का आश्वासन, पार्टी में एकजुटता और जगत प्रकाश नड्डा का प्रश्रय चाहिए। इसमें दो राय नहीं कि भाजपा की गोद में हिमाचल के मुख्यमंत्री के लिए राजनीतिक लालन पालन जारी है और इसी की कुछ खुराकें लेकर वह दिल्ली से लौट आए हैं। इन खुराकों में उनके लिए कितनी टॉनिक, इम्युनिटी बूस्टर तथा बाह्य वातावरण से सुरक्षित रहने का कवच मिलता है, यह आने वाला वक्त ही बताएगा।

चेचक और पल्स पोलियो के साथ कोरोना वायरस की तुलना उचित नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने देश को संबोधित करते हुए उल्लेख किया था कि पोलियो, चेचक, हेपेटाइटिस आदि बीमारियों के टीके, विदेश से आयातित होने में, दशकों बीत जाते थे। यह अर्द्धसत्य कथन है, लिहाजा अनुचित भी है। इतिहास गवाह है कि चेचक का टीका 1802 में ब्रिटिश भारत में आ चुका था। वह ब्रिटेन के वैज्ञानिक का अनुसंधान था और भारत में भी इस्तेमाल किया जाता था। बेशक चेचक ने करीब 3000 साल तक दुनिया को ‘बीमार’ रखा। झाड़-फूंक और रूढि़वादी तरीकों से चेचक का इलाज किया जाता था, नतीजतन करोड़ों अकाल मौतें हुईं। 20वीं सदी में भी दुनिया भर में करीब 30 करोड़ लोगों की मौतें हुईं। यह बेहद भयावह आंकड़ा था। भारत की आज़ादी के वक्त देश में चेचक काफी फैला हुआ था। भारत सरकार ने मई, 1948 में चेचक पर आधिकारिक बयान दिया और मद्रास (आज का चेन्नई) के किंग्स इंस्टीट्यूट में, चेचक के लिए, बीसीजी टीका बनाने की प्रयोगशाला शुरू की गई। साल 1949 में स्कूलों के स्तर पर बीसीजी टीकाकरण का भी आगाज़ कर दिया गया। मात्र दो साल के बाद 1951 में बीसीजी टीकाकरण का विस्तार देश भर में कर दिया गया। उस दौर में उप्र, बिहार, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और ओडिशा में चेचक सबसे अधिक फैला।

 यकीनन मौतें भी बहुत हुई होंगी! हालांकि उसका एक ठोस, साबित डाटा हमें नहीं मिल सका। अलबत्ता यह आंकड़ा लाखों में रहा होगा! 1962 में भारत में राष्ट्रीय चेचक उन्मूलन कार्यक्रम शुरू किया गया। उसके परिणाम अच्छे मिलने शुरू हुए थे कि चेचक का आखिरी और घोषित मामला 1977 में सोमालिया में मिला। आखिर वह सुखद पल और दिन भी सामने आया, जब दिसंबर, 1979 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेचक के खात्मे का ऐलान किया। मई, 1980 में 33वीं वर्ल्ड हेल्थ असेंबली ने भी इसकी आधिकारिक घोषणा की। बहरहाल तब तक भारत में चेचक लगभग समाप्त हो चुका था। आजकल भी कुछ मामले सामने आते हैं, जो देश और महामारी के स्तर पर नगण्य माने जा सकते हैं। पल्स पोलियो के संदर्भ में भारत ने सफलता और इतिहास के अध्याय लिखे हैं। एक ही दिन में पोलियो की 13 करोड़ से अधिक ‘दो बूंदें’ पिलाई गईं। साल 2011 में दो दिन के भीतर 17.2 करोड़ ‘दो बूंदें’ पिलाने की कामयाबी भी हासिल की गई। मौजूदा केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन 1993-98 के दौरान दिल्ली सरकार में स्वास्थ्य मंत्री थे। तब उन्होंने ‘पल्स पोलियो’ कार्यक्रम की शुरुआत की थी, जिसे 1995 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना में शामिल किया गया। तब देश के प्रधानमंत्री पी.वी.नरसिंहराव थे। भारत ने 24 अक्तूबर, 2012 को खुद को ‘पोलियो मुक्त’ घोषित कर लिया था, जिस पर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2014 के शुरू में ही मुहर लगा दी थी। तब भी भारत में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार थी। गौरतलब यह है कि जब राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री थे, तब भारत टीकों और टीकाकरण का हब नहीं था।

 दिवंगत प्रधानमंत्री ने अपने कार्यकाल में भारत को ‘टीका हब’ बनाने की शुरुआत की थी। यकीनन आयातित टीकों और दवाओं के भारत तक आने में वक्त लगता था और खासकर बीमार बच्चों की अकाल मौतें हो जाती थीं, लिहाजा देश में ही टीका उत्पादन और शोध के नए आयाम खोले गए। पुणे के सीरम इंस्टीट्यूट को भी विस्तार मिला और आज वह 170 से ज्यादा देशों में अपने टीके बेच रहा है। दुनिया के 65 फीसदी बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें सीरम का कोई न कोई टीका जरूर लगा होगा। मौजूदा मोदी सरकार के आने से पहले चेचक, पोलियो, तपेदिक, हेपेटाइटिस-बी, टिटनस, रूबेला, डीपीटी आदि बीमारियों के टीके भारत में बनने लगे थे और विश्व स्तर पर प्रख्यात हुए थे। यह दौर वैश्विक महामारी कोरोना वायरस का है। सीरम सबसे ज्यादा टीके उत्पादित कर रहा है। उसके टीके-कोविशील्ड-का बुनियादी शोध ब्रिटेन की एस्ट्राज़ेनेका कंपनी ने किया था। बौद्धिक संपदा का पेटेंट अधिकार भी उसी के नाम पर है, लिहाजा यह टीका स्वदेशी नहीं कहा जा सकता। प्रधानमंत्री मोदी यह दावा करना बंद कर दें। सिर्फ  ‘कोवैक्सीन’ टीका ही भारतीय है, क्योंकि उसमें भी भारत सरकार के आईसीएमआर की भागीदारी है। बुनियादी सवाल है कि पुराने कालखंड की बीमारियों और कोरोना जैसी महामारी की तुलना किन आधारों पर की जा सकती है? टीकों का आविष्कार पहले भी किया गया और अब भी किया गया है। अपने-अपने स्तर पर लड़ाई जारी है। ‘मिशन इंद्रधनुष’ ने टीकाकरण का कवरेज बढ़ाया है, क्योंकि बीमारियों के लिए शोध हो चुके थे और टीके-दवा उपलब्ध थे। तुलनात्मक उपलब्धियां क्या हैं?